लिप्यंतरण:( Yahdee bihil laahu manit taba'a ridwaanahoo subulas salaami wa yukhrijuhum minaz zulumaati ilan noori bi iznihee wa yahdeehim ilaa Siraatim Mustaqeem )
अल्लाह उसी (नूर) के ज़रिये उसे हिदायत देता है जो उसकी रज़ा का तालिब होता है — सलामती के रास्तों की तरफ़, और उन्हें अपनी इजाज़त से अंधेरों से निकालकर रोशनी में लाता है, और उन्हें सीधी राह दिखाता है।
इस आयत से ये मालूम होता है कि हिदायत उन्हीं को मिलती है जो रसूलुल्लाह ﷺ की पैरवी करते हैं।
रसूल ﷺ अल्लाह की हिदायत का ज़रिया हैं, इसलिए कोई शख्स अगर सच्ची राह चाहता है तो उसे नबी ﷺ से अलग रहकर नहीं मिल सकती।
इसलिए, "उसके ज़रिये हिदायत देता है" का मतलब है कि रसूल ﷺ की वसीलत के बग़ैर कोई राह नहीं पा सकता।
"नूर" और "ज़ुल्मात" (अंधेरे) के अल्फ़ाज़ से कई अहम बातें सामने आती हैं:
"सीधी राह दिखाता है" से मुराद ये है कि अल्लाह तआला सिर्फ़ ईमान ही नहीं देता, बल्कि नेक आमाल की भी तौफ़ीक़ देता है।
क्योंकि इस आयत में पहले ईमान का ज़िक्र हो चुका,
अब इस हिस्से में आमाल की सही रह दिखाने की बात है —
यानि सिर्फ़ मुसलमान कहलाना काफी नहीं, बल्कि सही रास्ते पर चलना भी ज़रूरी है।
The tafsir of Surah Maidah verse 16 by Ibn Kathir is unavailable here.
Please refer to Surah Maidah ayat 15 which provides the complete commentary from verse 15 through 16.

सूरा आयत 16 तफ़सीर (टिप्पणी)