Quran Quote  : 

कुरान मजीद-5:18 सुरा हिंदी अनुवाद, लिप्यंतरण और तफ़सीर (तफ़सीर).

وَقَالَتِ ٱلۡيَهُودُ وَٱلنَّصَٰرَىٰ نَحۡنُ أَبۡنَـٰٓؤُاْ ٱللَّهِ وَأَحِبَّـٰٓؤُهُۥۚ قُلۡ فَلِمَ يُعَذِّبُكُم بِذُنُوبِكُمۖ بَلۡ أَنتُم بَشَرٞ مِّمَّنۡ خَلَقَۚ يَغۡفِرُ لِمَن يَشَآءُ وَيُعَذِّبُ مَن يَشَآءُۚ وَلِلَّهِ مُلۡكُ ٱلسَّمَٰوَٰتِ وَٱلۡأَرۡضِ وَمَا بَيۡنَهُمَاۖ وَإِلَيۡهِ ٱلۡمَصِيرُ

लिप्यंतरण:( Wa qaalatil Yahoodu wan Nasaaraa nahnu abnaaa'ul laahi wa ahibbaaa'uh; qul falima yu'azzibukum bizunoobikum bal antum basharum mimman khalaq; yaghfiru limai yashaaa'u wa yu'azzibu mai yashaaa'; wa lillaahi mulkus samaawaati wal ardi wa maa bainahumaa wa ilaihil maseer )

और यहूद व नसारा कहते हैं: “हम अल्लाह के बेटे और उसके प्यारे हैं” [75]। (ऐ नबी!) आप फ़रमा दीजिए: “तो फिर वह तुम्हारे गुनाहों पर तुम्हें सज़ा क्यों देता है?” [76] दरअस्ल तुम भी उसी की मख़्लूक़ हो, जैसे और इंसान हैं। वह जिसे चाहता है बख़्श देता है और जिसे चाहता है अज़ाब देता है [77]। और आसमानों और ज़मीन और जो कुछ इनके दरमियान है — सब की बादशाही अल्लाह ही की है, और उसी की तरफ़ आख़िरी लौटना है।

सूरा आयत 18 तफ़सीर (टिप्पणी)



  • मुफ़्ती अहमद यार खान

📖 सूरा अल-मायिदा – आयत 18 की तफ़्सीर

 

✅ [75] यहूद व नसारा का घमंड और ग़लत दावा

  • यह आयत उस वक़्त नाज़िल हुई जब अहले किताब के कुछ लोग रसूलुल्लाह ﷺ के पास आए और आपने उन्हें इस्लाम की दावत दी और अल्लाह के अज़ाब से डराया।
  • उन्होंने तकब्बुर से कहा: “हम तो अल्लाह के बेटे और उसके प्यारे हैं।”
    इसका मक्सद ये था कि अल्लाह हमें कभी अज़ाब नहीं देगा, जैसे एक बाप अपने बेटे को कभी सज़ा नहीं देता।
  • यह ग़लत फ़हमियां उन्हें गुमराही की तरफ़ ले गईं।
    उन्होंने समझ लिया कि महज़ निस्बत या नस्ल का दावा ही काफ़ी है, और अमल की ज़रूरत नहीं
  • आज भी कुछ लोग अहले बैत या औलिया की मुहब्बत का दावा कर के अमल छोड़ देते हैं,
    और समझते हैं कि ये मोहब्बत ही काफ़ी है — यह सोच भी ख़तरेनाक गुमराही है।
  • क़ुरआन ने बार-बार ईमान के साथ “अमाले-शालेह” को जोड़ा है, ताकि निस्बत की ग़लत तस्सली का पर्दा फाश हो जाए।

✅ [76] दावे का अक़ली रद्द – अगर प्यारे हो तो अज़ाब क्यों?

  • अल्लाह ने रसूल ﷺ से फ़रमाया कि उनसे पूछो:
    “अगर तुम वाक़ई अल्लाह के प्यारे हो,
    तो वो तुम्हें **तुम्हारे गुनाहों पर सज़ा क्यों देता है?”
  • यहूद का अकीदा था कि अगर उन्हें सज़ा दी भी गई, तो सिर्फ़ 40 दिन के लिए
    वो भी बछड़ा-पूजा की वजह से।
  • लेकिन सज़ा का होना ही इस बात का सबूत है कि तुम अल्लाह के खास नहीं,
    वरना अज़ाब होता ही क्यों?
  • हर इंसान, चाहे वो किसी उम्मत या नस्ल से हो,
    अल्लाह की अदल व इनसाफ़ से बाहर नहीं

✅ [77] अल्लाह की मग़फ़िरत और अज़ाब — हिकमत और इनसाफ़ के साथ

  • “वह जिसे चाहे बख़्श दे, और जिसे चाहे अज़ाब दे”
    इसका मतलब ये नहीं कि अल्लाह बेजा या नाइंसाफ़ी करता है
  • उसकी मग़फ़िरत और अज़ाब, दोनों हिकमत और इंसाफ़ पर मबनी हैं।
  • जैसा कि सूरा अन-निसा (4:40) में फ़रमाया:
    “अल्लाह ज़र्रे भर भी ज़ुल्म नहीं करता।”
  • इसलिए ये ग़लत है कि कोई कहे — "अगर अल्लाह चाहे तो बेगुनाह को भी सज़ा दे सकता है"
    ऐसी बातें अंधी तस्लीम या ग़लत तौहीद के शुमार में आती हैं।
  • अल्लाह तआला का हर फ़ैसला 'हक़', इनसाफ़ और हिकमत पर है

Ibn-Kathir

The tafsir of Surah Maidah verse 18 by Ibn Kathir is unavailable here.
Please refer to Surah Maidah ayat 17 which provides the complete commentary from verse 17 through 18.

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