Quran Quote  : 

कुरान मजीद-5:55 सुरा हिंदी अनुवाद, लिप्यंतरण और तफ़सीर (तफ़सीर).

إِنَّمَا وَلِيُّكُمُ ٱللَّهُ وَرَسُولُهُۥ وَٱلَّذِينَ ءَامَنُواْ ٱلَّذِينَ يُقِيمُونَ ٱلصَّلَوٰةَ وَيُؤۡتُونَ ٱلزَّكَوٰةَ وَهُمۡ رَٰكِعُونَ

लिप्यंतरण:( Innamaa waliyyukumul laahu wa Rasooluhoo wal lazeena aamanul lazeena yuqeemoonas Salaata wa yu'toonaz Zakaata wa hum raaki'oon )

"तुम्हारा दोस्त तो बस अल्लाह है [174], और उसका रसूल, और वे मोमिन जो नमाज़ क़ायम रखते हैं, ज़कात अदा करते हैं और अल्लाह के आगे झुकते हैं [175]।"

सूरा आयत 55 तफ़सीर (टिप्पणी)



  • मुफ़्ती अहमद यार खान

📖 सूरा अल-माइदा – आयत 55 की तफ़्सीर

 

✅ [174] "वली" (दोस्त) का मतलब

"वली" का अर्थ यहां है — सच्चा मददगार, हामी और सरपरस्त, न कि ख़लीफ़ा या सियासी रहनुमा।
इसकी तफ़्सीर में कुछ अहम बातें:

  • अल्लाह और उसका रसूल भी "वली" कहे गए, जबकि वे खलीफ़ा नहीं, बल्कि रब्ब और रसूल हैं।
  • "वली" का मतलब हर एक के लिए अलग-अलग ओहदा मानना मुनासिब नहीं।
  • हज़रत अली (रज़ि.अ) उस वक़्त खलीफ़ा नहीं थे, इसलिए यह आयत उनकी खिलाफ़त के बारे में नहीं हो सकती।
  • "सिर्फ़" (إنما) का इस्तेमाल यहां ईमान वालों के बीच दोस्ती और वफ़ादारी की हदबंदी के लिए है — यानी सच्ची वलीयत उन्हीं को हासिल है जो अल्लाह, रसूल और नमाज़ व ज़कात अदा करने वाले मोमिनों के साथ हैं।
    अगर इसे सियासी खिलाफ़त की दलील माना जाए, तो बाकी चार खुलफ़ा-ए-राशिदीन की वैधता पर सवाल खड़ा हो जाएगा, जो ग़लत है।

✅ [175] नाज़िल होने का संदर्भ

यह आयत हज़रत अब्दुल्लाह बिन सलाम (रज़ि.अ) के बारे में नाज़िल हुई, जो यहूदी आलिम थे और बाद में इस्लाम कबूल कर लिया।
जब उन्होंने देखा कि यहूदी क़ौम उनसे कट्टी कर रही है, तो उन्हें तन्हाई और तर्ज़-बह-तर्ज़ महसूस होने लगा। इस पर यह आयत नाज़िल हुई कि:

  • सच्चा दोस्त और मददगार तो अल्लाह, उसका रसूल और वे ईमान वाले हैं जो नमाज़ पढ़ते, ज़कात अदा करते, और अल्लाह के आगे झुकते हैं।

यह आयत इस्लामी भाईचारे और अख़ूव्वत (भाईचारे) की अहमियत को उजागर करती है — कि एक मोमिन को बाहरी तज़्लीलों या समाज की बेरुख़ी से मायूस नहीं होना चाहिए, क्यूंकि अल्लाह और उसका जमाअत ही उसका असली सहारा है।

Ibn-Kathir

The tafsir of Surah Maidah verse 55 by Ibn Kathir is unavailable here.
Please refer to Surah Maidah ayat 54 which provides the complete commentary from verse 54 through 56.

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