लिप्यंतरण:( Qul hal unabbi'ukum bisharrim min zaalika masoobatan 'indal laah; malla'ana hul laahu wa ghadiba 'alaihi wa ja'ala minhumul qiradata wal khanaazeera wa 'abadat Taaghoot; ulaaa'ika sharrum makaananw wa adallu 'an Sawaaa'is Sabeel )
"कह दो: क्या मैं तुम्हें बताऊँ उन लोगों के बारे में जो अल्लाह के नज़दीक इससे भी बुरे हाल में हैं? वो हैं जिन पर अल्लाह ने लानत की, जिन पर उसका ग़ज़ब हुआ, और उसने उनमें से कुछ को बंदर और सूअर बना दिया, और जिन्हें ताग़ूत (झूठे ख़ुदाओं) की बंदगी करने वाला बना दिया [183]। यही लोग दर्जे में सबसे बदतर और सीधी राह से सबसे ज़्यादा भटके हुए हैं।"
इस आयत से यह बात ज़ाहिर होती है कि जो लोग तमाम पैग़म्बरों पर ईमान रखते हैं, वो अल्लाह की रहमत के साए में होते हैं। लेकिन जो कोई एक भी नबी का इनकार करता है, उस पर अल्लाह का ग़ज़ब और लानत होती है।
यह हिस्सा यहूदियों को मुक़ातिब करता है, और उनके अतीत और हाल की याद दिलाता है:
इस आयत से यह बात साबित होती है कि सिर्फ़ नबीज़ादे होना या पीर-पैग़म्बर की औलाद होना कोई फ़ज़ीलत नहीं देता, जब तक कि इंसान अल्लाह का फ़रमाबरदार न हो।
उनकी यह तकब्बुर भरी सोच कि वो सबसे बेहतर हैं, उनके असल अमल के मुक़ाबले में बिल्कुल ग़लत साबित होती है।
The tafsir of Surah Maidah verse 60 by Ibn Kathir is unavailable here.
Please refer to Surah Maidah ayat 59 which provides the complete commentary from verse 59 through 63.

सूरा आयत 60 तफ़सीर (टिप्पणी)