लिप्यंतरण:( Zaalika bi annahum shaaaqqul laaha wa Rasoolah; wa mai yushaqiqil laaha wa Rasoolahoo fa innal laaha shadeedul 'iqaab )
यह (सज़ा) इसलिए हुई कि उन्होंने अल्लाह और उसके रसूल का इन्कार और मुक़ाबला किया [29]। और जो कोई अल्लाह और उसके रसूल का मुक़ाबला करेगा, तो बेशक अल्लाह की सज़ा बहुत सख़्त है।
इस आयत में साफ़ किया गया कि काफ़िरों की शिकस्त और सज़ा उनकी अल्लाह और उसके रसूल ﷺ की मुख़ालफ़त की वजह से थी। मुसलमान का ग़ज़ब (ग़ुस्सा) जंग में सिर्फ़ दीन की हिफ़ाज़त के लिए होना चाहिए, न कि शख़्सी दुश्मनी के लिए। इस्लाम में जंग का मक़सद हक़ और दीन को क़ायम करना है, न कि ज़मीन या दौलत हासिल करना। दुनियावी मक़सद के लिए जंग फ़साद है, जबकि अल्लाह की राह में जंग असल जिहाद है।
The tafsir of Surah Al-Anfal verse 13 by Ibn Kathir is unavailable here.
Please refer to Surah Anfal ayat 11 which provides the complete commentary from verse 11 through 14.

सूरा आयत 13 तफ़सीर (टिप्पणी)