लिप्यंतरण:( Yaaa aiyuhan Nabiyyu harridil mu'mineena 'alal qitaal; iny-yakum minkum 'ishroona saabiroona yaghliboo mi'atayn; wa iny-yakum minkum mi'atuny yaghlibooo alfam minal lazeena kafaroo bi anahum qawmul laa yafqahoon )
ऐ नबी! ऐ ग़ैब की ख़बर देने वाले! आप मुसलमानों को जिहाद पर उभारिए [144]। अगर तुम में बीस सब्र करने वाले होंगे तो वे दो सौ पर ग़ालिब आ जाएंगे [145], और अगर तुम में सौ होंगे तो वे हज़ार कुफ़्फ़ार पर ग़ालिब होंगे, क्योंकि वे लोग समझ नहीं रखते [146]।
इस आयत में अल्लाह तआला ने अपने रसूल ﷺ को हुक्म दिया कि मोमिनों को जिहाद की रग़बत दिलाएं। जिहाद अल्लाह की राह में सबसे बड़ी इबादतों में से है। जो लोग इस से रोकते हैं, वे अल्लाह के हुक्म की मुख़ालफ़त करते हैं। मुसलमानों को जिहाद की तरफ़ उभारने के लिए हर जाइज़ तरीका इस्तेमाल किया जा सकता है, जैसे मुजाहिदीन की मदद करना, उनके घर वालों की परवरिश करना और उनकी बहादुरी की क़द्र करना।
अल्लाह तआला ने मोमिनों को खुशख़बरी दी कि अगर वे सब्र और इस्तिक़ामत से काम लें तो अल्लाह की मदद से एक मोमिन दस कुफ़्फ़ार पर ग़ालिब आ जाएगा। यह उस वक़्त मुसलमानों पर हुक्म था कि दुश्मन अगर दस गुना भी ज़्यादा हो तो पीछे न हटें। बाद में आयत "अब अल्लाह ने तुम्हारा बोझ हल्का कर दिया" नाज़िल हुई, जिससे इस हुक्म की ताख़्फ़ीफ़ कर दी गई, लेकिन अल्लाह की मदद की खुशख़बरी बाक़ी रही।
कुफ़्फ़ार को नासमझ कहा गया क्योंकि उनका मक़सद सिर्फ़ शौकत, घमंड और दुनियावी फ़ायदा था। उनका लड़ना जानवरों की तरह बेतुका और बेमक़सद था। इसके मुक़ाबले में मुसलमान अल्लाह और उसके रसूल ﷺ की ख़ुशनूदी के लिए लड़ते हैं, और यही उनकी असली रूहानी ताक़त और इमानी हौसला है।
The tafsir of Surah Al-Anfal verse 65 by Ibn Kathir is unavailable here.
Please refer to Surah Anfal ayat 64 which provides the complete commentary from verse 64 through 66.

सूरा आयत 65 तफ़सीर (टिप्पणी)