लिप्यंतरण:( Wa mai yuwallihim yawma'izin duburahooo illaa mutaharrifal liqitaalin aw mutahaiyizan ilaa fi'atin faqad baaa'a bighadabim minal laahi wa ma'waahu Jahannamu wa bi'sal maseer )
और जिस दिन (जंग के मैदान में) कोई उनसे पीठ फेर ले, सिवाय इस हालत के कि वह जंग की चाल के तौर पर ऐसा करे या अपनी जमाअत से मिलने के लिए हटे, तो वह अल्लाह के ग़ज़ब [32] का शिकार होगा और उसका ठिकाना जहन्नम है, और वह बहुत ही बुरा ठिकाना है [33]।
इस आयत में बयान है कि जंग के मैदान से बिना वजह भागना बड़ा गुनाह है और यह अल्लाह के ग़ज़ब को लाता है।
भले दुश्मन की तादाद ज़्यादा क्यों न हो, ईमान वालों पर डटे रहना फ़र्ज़ है।
मोमिन के लिए मौत भी शहादत है, इसलिए भागना कमज़ोरी है।
पहली दो शक्लें जायज़ हैं, लेकिन तीसरी हराम है, जब तक कि कोई असली मजबूरी न हो।
ग़ज़वा-ए-उहुद और ह़ुनैन में कुछ सहाबा पीछे हटे, मगर अल्लाह ने बाद में उन्हें माफ़ कर दिया।
तफ़्सीर रूहुल बय़ान में आया है कि जिहाद से भागना इस्लाम के 70 बड़े गुनाहों में से एक है।
The tafsir of Surah Al-Anfal verse 16 by Ibn Kathir is unavailable here.
Please refer to Surah Anfal ayat 15 which provides the complete commentary from verse 15 through 16.

सूरा आयत 16 तफ़सीर (टिप्पणी)