लिप्यंतरण:( Zaalikum wa annal laaha moohinu kaidil kaafireen )
यह [38] (फ़तह और मदद), और बेशक अल्लाह काफ़िरों की चालों को कमज़ोर कर देता है।
यह आयत ईमान वालों के लिए तसल्ली और खुशी का पैग़ाम है।
अल्लाह जैसे फरमा रहा हो कि:
“ऐ मेरे हबीब ﷺ के चाहने वालो! यह जीत और माल-ए-ग़नीमत तो अभी का इनाम है,
आगे भी तुम्हारे लिए दुनिया और आख़िरत में इज़्ज़त और बरकतें हैं।”
साथ ही यह भी बयान है कि काफ़िर चाहे जितनी चालें चलें,
अल्लाह हमेशा उनकी योजनाओं को नाकाम कर देता है।
ग़ज़वा-ए-बद्र में जो इज़्ज़त और मदद दी गई, वह तो बस इब्तिदा (शुरुआत) है,
आगे और भी फ़ज़ल और नुसरत ईमान वालों के लिए मुहैय्या होगी।
The tafsir of Surah Al-Anfal verse 18 by Ibn Kathir is unavailable here.
Please refer to Surah Anfal ayat 17 which provides the complete commentary from verse 17 through 18.

सूरा आयत 18 तफ़सीर (टिप्पणी)