लिप्यंतरण:( Wa izaa ra awhum qaalooo inna haaa'ulaaa'i ladaaal loon )
इससे हमें यह सीख मिलती है कि अल्लाह के नेक बंदों, ख़ासकर नबी ﷺ के मुबारक सहाबा को गुमराह कहना काफ़िरों का तरीक़ा है, और उनका मज़ाक़ उड़ाना कुफ़्र का अमल है।
🔹 सहाबा-ए-किराम (रज़ि.अ) वह लोग हैं जिन पर अल्लाह और उसके रसूल ﷺ की ख़ास रहमत थी।
🔹 उन्हें गुमराह कहना या उनकी शान में कोई गुस्ताख़ी करना ख़ुद अल्लाह और उसके रसूल ﷺ के फ़ैसले की मुख़ालिफ़त करना है।
🔹 इस्लाम हमें सिखाता है कि जिन पर अल्लाह राज़ी हो चुका, उनके बारे में ऐतराज़ उठाना एक ख़तरनाक सोच है।
🔹 लिहाज़ा, मोमिन को सहाबा-ए-किराम की मोहब्बत और अज़मत अपने दिल में रखनी चाहिए और उनकी तौहीन से बचना चाहिए।
The tafsir of Surah Mutaffifin verse 32 by Ibn Kathir is unavailable here.
Please refer to Surah Mutaffifin ayat 29 which provides the complete commentary from verse 29 through 36.

सूरा आयत 32 तफ़सीर (टिप्पणी)