लिप्यंतरण:( Wa maaa ursiloo 'alaihim haafizeen )
इसलिए इंसान को चाहिए कि वह अपनी आख़िरत की फ़िक्र को अपनी ज़िम्मेदारी बनाए और दूसरों की फ़िक्र में इस क़दर न डूब जाए कि अपनी ही निजात (मुक्ति) से ग़ाफ़िल हो जाए।
🔹 हर शख़्स को अपने आमाल (कर्मों) का हिसाब देना है, इसलिए उसे चाहिए कि वह सबसे पहले अपने हालात पर ध्यान दे।
🔹 दूसरों की ग़लतियों पर ध्यान देने से पहले इंसान को अपनी ग़लतियों को सुधारने की कोशिश करनी चाहिए।
🔹 दूसरों की हिदायत की फ़िक्र करना अच्छा है, लेकिन अगर इंसान ख़ुद ही ग़फलत में पड़ जाए, तो यह उसकी अपनी आख़िरत के लिए ख़तरनाक हो सकता है।
🔹 इस्लाम तवाज़ुन (संतुलन) सिखाता है – न तो दूसरों की बेतहाशा चिंता में पड़कर अपनी आख़िरत भुलानी चाहिए, और न ही दूसरों की भलाई के बारे में बिल्कुल लापरवाह होना चाहिए।
The tafsir of Surah Mutaffifin verse 33 by Ibn Kathir is unavailable here.
Please refer to Surah Mutaffifin ayat 29 which provides the complete commentary from verse 29 through 36.

सूरा आयत 33 तफ़सीर (टिप्पणी)