लिप्यंतरण:( Muzabzabeena baina zaalika laaa ilaa haaa' ulaaa'i wa laaa ilaa haaa'ulaaa'; wa mai yudli lillaahu falan tajida lahoo sabeela )
ये (मुनाफ़िक़) लोग झूलते रहते हैं — कभी इधर, कभी उधर, न पूरी तरह मुसलमानों के साथ होते हैं, न काफ़िरों के साथ [422]। और जिसे अल्लाह गुमराह कर दे, उसके लिए तुम हरगिज़ कोई राह नहीं पा सकते।
इस आयत में मुनाफ़िक़ों की दोमुंही और डगमगाई हुई हालत को बयान किया गया है।
इससे यह हिदायत मिलती है कि:
इस आयत का आख़िरी हिस्सा बहुत सख़्त चेतावनी है:
अगर कोई शख़्स बार-बार हक़ को ठुकराए,
फरेब और मुनाफ़िक़त में डूबा रहे,
तो अल्लाह उसे उसके हाल पर छोड़ देता है,
और फिर कोई नबी, वली या आलिम भी उसे राह नहीं दिखा सकता।
हिदायत सिर्फ़ अल्लाह का इनआम है, जो सच्चे तालिबों को मिलता है।
हम सबको चाहिए कि हमेशा दुआ करें:
"ऐ अल्लाह! हमें हिदायत पर क़ायम रख और मुनाफ़िक़त से बचा"।
आमीन।
The tafsir of Surah Nisa verse 143 by Ibn Kathir is unavailable here.
Please refer to Surah Nisa ayat 142 which provides the complete commentary from verse 142 through 143.

सूरा आयत 143 तफ़सीर (टिप्पणी)