Quran Quote  : 

कुरान मजीद-4:83 सुरा हिंदी अनुवाद, लिप्यंतरण और तफ़सीर (तफ़सीर).

وَإِذَا جَآءَهُمۡ أَمۡرٞ مِّنَ ٱلۡأَمۡنِ أَوِ ٱلۡخَوۡفِ أَذَاعُواْ بِهِۦۖ وَلَوۡ رَدُّوهُ إِلَى ٱلرَّسُولِ وَإِلَىٰٓ أُوْلِي ٱلۡأَمۡرِ مِنۡهُمۡ لَعَلِمَهُ ٱلَّذِينَ يَسۡتَنۢبِطُونَهُۥ مِنۡهُمۡۗ وَلَوۡلَا فَضۡلُ ٱللَّهِ عَلَيۡكُمۡ وَرَحۡمَتُهُۥ لَٱتَّبَعۡتُمُ ٱلشَّيۡطَٰنَ إِلَّا قَلِيلٗا

लिप्यंतरण:( Wa izaa jaaa'ahum amrum minal amni awil khawfi azaa'oo bihee wa law raddoohu ilar Rasooli wa ilaaa ulil amri minhum la'alimahul lazeena yastambitoonahoo minhum; wa law laa fadlul laahi 'alaikum wa rahmatuhoo lattaba'tumush Shaitaana illaa qaleelaa )

और जब उनके पास कोई खबर पहुँचती है जो उन्हें खुशी देती है या डराती है, तो वे उसे (तुरंत) फैला देते हैं [263]। और अगर वे उसे रसूल और अपने हुक्म चलाने वालों (अहलुल-अमर) की तरफ़ लौटा देते, तो ज़रूर जो लोग उससे सही नतीजा निकाल सकते हैं [265], वे उसकी हक़ीक़त जान लेते [264]। और अगर तुम पर अल्लाह का फ़ज़ल और उसकी रहमत न होती, तो तुम यक़ीनन शैतान के पीछे लग जाते, सिवाय कुछ थोड़े लोगों के [266]।

सूरा आयत 83 तफ़सीर (टिप्पणी)



  • मुफ़्ती अहमद यार खान

📖 सूरा अन-निसा – आयत 83 की तफ़्सीर

 

✅ [263] हर खबर फैलाना मुनासिब नहीं – नुक़सान का अंदेशा

यह उन भले लेकिन सादा मुसलमानों के बारे में है जो हर सुनी-सुनाई बात फैला देते थे—चाहे वह उम्मीद की हो या डर की।
उन्हें यह एहसास नहीं था कि कौन-सी जानकारी आम करनी चाहिए और कौन-सी नहीं।
इससे सबक़:

  • हर तरह की खबर आम करने से बेवजह फसाद, डर या गलतफहमी फैल सकती है।
  • खबर फैलाने से पहले हिकमत और समझ-बूझ ज़रूरी है।

✅ [264] अहम मामलों को अहलुल-अमर को सौंपना

"अहलुल-अमर" से मुराद है—हज़रत मुहम्मद ﷺ के वह सहाबी जो इल्म, तजुर्बे और दानाई में माहिर थे, जैसे:

  • ख़ुलफ़ा-ए-राशिदीन (चारों ख़लीफ़ा)
  • हज़रत अब्दुल्लाह बिन अब्बास (रज़ि.) व अन्य
    अगर लोग अहम और संवेदनशील मामलों को उन्हें या सीधे रसूल ﷺ को पेश करते, तो सही और मुनासिब राहनुमाई मिल जाती।
    इससे हुक्म निकलता है कि दीन और समाज के मसाइल में उलमा और रहनुमाओं से मशविरा ज़रूरी है।

✅ [265] कुरआन को समझने के लिए उलमा की तरफ़ रजू करना

इससे एक अहम उसूल मालूम हुआ:

  • कुरआन को सही समझने और लागू करने के लिए फ़ुक़हा और उलमा की तरफ़ रजू करना ज़रूरी है।
  • अपनी राय से या ज़िद में आकर गहरी दीनदार बातों की तफ़्सीर करना गुमराही का सबब बन सकता है।
  • जब मामूली खबरें भी समझदार लोगों के पास भेजी जानी चाहिए, तो दीन की बातें तो उनसे भी ज़्यादा अहल लोगों के पास जानी चाहिए।

✅ [266] अल्लाह की हिफ़ाज़त ने सहाबा को बचाया

इससे पता चला कि सहाबा-ए-किराम (रज़ि.) में से कोई भी गुमराह नहीं हुआ
अल्लाह के फ़ज़ल और रहमत ने उन्हें शैतान से महफ़ूज़ रखा।
हाँ, उनके मरतबे अलग-अलग थे, लेकिन हर एक अपने दर्जे में सच्चाई और स्थिरता पर क़ायम रहा।
यह आयत उस गलत दावे की भी तस्दीक़ करती है कि कोई सहाबी शैतान के पीछे चला गया—ऐसा नहीं हुआ।

Ibn-Kathir

The tafsir of Surah Nisa verse 83 by Ibn Kathir is unavailable here.
Please refer to Surah Nisa ayat 82 which provides the complete commentary from verse 82 through 83.

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