लिप्यंतरण:( Am yahsudoonan naasa 'alaa maaa aataahumul laahu min fadlihee faqad aatainaaa Aala Ibraaheemal Kitaaba wal Hikmata wa aatainaahum mulkan 'azeemaa )
क्या वे लोगों से इस बात पर जलते हैं कि अल्लाह ने उन्हें अपने फ़ज़्ल से क्या कुछ दे दिया? [189] तो हमने तो इब्राहीम के घराने को किताब और हिकमत अता की थी [190] और उन्हें एक बड़ी सल्तनत दी थी [191]।
यह आयत यहूदियों की उस हसद (जलन) की ओर इशारा करती है जो वे नबी करीम मुहम्मद ﷺ और उनके साथियों से रखते थे। वे अल्लाह द्वारा उन्हें दी गई इज़्ज़त, रहनुमाई और रहमतों को देखकर कुढ़ते थे। सच्चाई को मानने के बजाय, वे इस बात से परेशान थे कि आख़िरी रसूल एक अरब में से क्यों आया, बनी इस्राईल में से क्यों नहीं।
इसमें यह समझाया गया कि पैग़म्बरी, ईमान और तक़्वा अल्लाह की ख़ास नेअमतें हैं, जो वह जिसे चाहे अता करता है। न कोई नसब (वंश) का हक़दार है, न कोई अपने फ़ज़ीलत या कोशिश की बिना पर दावा कर सकता है। यह सब कुछ अल्लाह के करम से होता है।
इससे ये बातें निकलती हैं:
यहां जिस "बड़ी सल्तनत" का ज़िक्र है, उससे मुराद दुनिया की हुकूमत है, जो अल्लाह ने कुछ पैग़म्बरों को दी, जैसे:
इन दोनों को पैग़म्बरी और बादशाहत दोनों मिलीं। फिर अगर अल्लाह ने अपने महबूब नबी मुहम्मद ﷺ को भी पैग़म्बरी के साथ असर व नफ़ूज़ दिया है, तो इस पर कुफ़्फ़ार को क्यों तकलीफ़ होती है? उनकी नफ़रत उनकी तकब्बुर को दिखाती है, जबकि अल्लाह का फ़ैसला हिकमत और इन्साफ़ पर है।
The tafsir of Surah Nisa verse 54 by Ibn Kathir is unavailable here.
Please refer to Surah Nisa ayat 53 which provides the complete commentary from verse 53 through 55.

सूरा आयत 54 तफ़सीर (टिप्पणी)