लिप्यंतरण:( Minal lazeena haadoo yuharrifoonal Kalima 'am mawaadi'ihee wa yaqooloona sami'naa wa 'asainaa wasma' ghaira musma'inw wa raa'inaa laiyam bi alsinatihim wa ta'nan fiddeen; wa law annahum qaaloo sami'naa wa ata'naa wasma' wanzurnaa lakaana khairal lahum wa aqwama wa laakil la' a'nahumul laahu bikufrihim falaa yu'minoona illaa qaleela )
यहूदियों में कुछ ऐसे हैं जो बातों को उनके असली स्थान से बदल देते हैं [169], और कहते हैं: "हमने सुना और नाफ़रमानी की," और "तू हमारी सुन," मगर उनका मतलब होता है कि "हमें सुनना न पड़े।" वे अपनी ज़बानों को तोड़-मरोड़ कर [170] और दीन का मज़ाक उड़ाते हुए [171] ऐसा कहते हैं। अगर वे कहते: "हमने सुना और माना," और "हमारी बात सुनो और हम पर नज़र रखो" [172], तो यह उनके लिए बेहतर और सीधी बात होती [173]। मगर अल्लाह ने उन पर लानत कर दी है, इसलिए वे बहुत थोड़े ही ईमान लाते हैं [174]।
रिफाआ बिन ज़ैद और मालिक बिन हिशाम जैसे कुछ यहूदी रसूलुल्लाह ﷺ के पास आते, सुनने का दिखावा करते, और कहते: "हमने सुना", लेकिन अंदर से नाफ़रमानी और तौहीन का भाव रखते। वे ताना मारते हुए कहते: "तू सुन", लेकिन मतलब होता: "हमें और मत सुनाओ।" उनके लहज़े और अंदाज़ से उनकी नफ़रत और निफ़ाक़ ज़ाहिर होती थी, इसलिए यह आयत नाज़िल हुई।
वे जानबूझकर "रािइना" शब्द का इस्तेमाल करते, जिसका मतलब है: "हमारी तरफ़ ध्यान दो", लेकिन ज़रा सा लहज़ा बदलकर उसे "राअेना" जैसा बना देते, जिसका मतलब होता: "बेवक़ूफ़" या "चरवाहा" — एक तौहीन भरा शब्द। इससे सीख मिलती है: ऐसे शब्दों से परहेज़ करना चाहिए जिनमें धोखा या दोहरे मतलब की संभावना हो, ख़ासकर अल्लाह या उसके रसूल ﷺ के बारे में।
ये यहूदी लोग इशारों और तंज़ से रसूल ﷺ की तौहीन करते, फिर आपस में बैठकर ठहाके लगाते और कहते: "अगर वह सच्चे नबी होते, तो हमारी बातों का असल मतलब समझ जाते!" — इस तरह वे नबी की इल्म पर ताना मारते। इससे यह हिदायत मिलती है: रसूल ﷺ के इल्म का मज़ाक उड़ाना, दरअसल अल्लाह के दीन का मज़ाक है। ऐसे लोग दीन के ताने देने वाले कहलाते हैं, और आज भी जो लोग ऐसे बोल बोलते हैं, उन्हें इससे सबक लेना चाहिए।
"रािइना" की जगह उन्हें कहना चाहिए था: "उनज़ुरना", यानी "हम पर ध्यान दो" — यह एक मुहब्बत भरा और साफ़ लफ़्ज़ है, जिसमें कोई बुरे मानी नहीं निकलते। इससे पता चलता है कि रसूल ﷺ से बात करते वक़्त आदब और साफ़ ज़बान का इस्तेमाल ज़रूरी है।
इस आयत से यह शिक्षा मिलती है: जो लोग रसूल ﷺ की तौक़ीर करते हैं, उन्हें खुद ही भलाई और बरकत हासिल होती है। और जो बेअदबी करते हैं, वे ख़ुद नुकसान और रुसवाई का शिकार बनते हैं।
जो लोग रसूलुल्लाह ﷺ को नहीं मानते, उनका अल्लाह पर ईमान भी मुकम्मल नहीं माना जाता। सिर्फ़ अल्लाह को मान लेना सच्चा ईमान नहीं, वरना शैतान भी अल्लाह को मानता है, फिर भी काफ़िर है। कुछ यहूदी पिछले अंबिया पर ईमान लाते थे, लेकिन अंतिम नबी मुहम्मद ﷺ का इंकार उनकी ईमानदारी को नष्ट कर देता है।
The tafsir of Surah Nisa verse 46 by Ibn Kathir is unavailable here.
Please refer to Surah Nisa ayat 44 which provides the complete commentary from verse 44 through 46.

सूरा आयत 46 तफ़सीर (टिप्पणी)