Quran Quote  : 

कुरान मजीद-2:107 सुरा हिंदी अनुवाद, लिप्यंतरण और तफ़सीर (तफ़सीर).

قَدِيرٌ أَلَمۡ تَعۡلَمۡ أَنَّ ٱللَّهَ لَهُۥ مُلۡكُ ٱلسَّمَٰوَٰتِ وَٱلۡأَرۡضِۗ وَمَا لَكُم مِّن دُونِ ٱللَّهِ مِن وَلِيّٖ وَلَا نَصِيرٍ

लिप्यंतरण:( Alam ta'lam annallaaha lahoo mulkus samaawaati wal ard; wa maa lakum min doonil laahi minw waliyyinw wa laa naseer )

"क्या तुम नहीं जानते कि आसमानों और ज़मीन की बादशाही अल्लाह ही की है [211], और अल्लाह के सिवा तुम्हारा न कोई मददगार है और न ही कोई सहारा [212]?"

सूरा आयत 107 तफ़सीर (टिप्पणी)



  • मुफ़्ती अहमद यार खान

[211] अल्लाह की बादशाही और मुकम्मल इख़्तियार

  • अल्लाह ही के पास आसमानों और ज़मीन की बादशाही (राज, हुकूमत) है।
  • वो जिस क़ानून या शरीअत को चाहे लागू करे, और जब चाहे उसमें तब्दीली करे —
    ये सिर्फ़ उसी का हक़ है।
  • क़ुदरत के क़ानून जैसे दिन और रात का बदलना, मौसमों का आना-जाना —
    ये सब इस बात की निशानी हैं कि अगर तख़लीक़ के निज़ाम में तब्दीलियाँ होती हैं,
    तो शरीअत के हुक्मों में तब्दीली (नासिख़ व मंसूख़) भी अल्लाह के हिकमत से होती है।

📌 सीख:
ये आयत इंसानों को तफ़क्कुर (ग़ौर) की दावत देती है — कि अल्लाह जिस चीज़ को चाहे,
जिस वक़्त चाहे, जिस तरह चाहे — अपने इख़्तियार से हुक्म करता है।

[212] अल्लाह की सज़ा से कोई नहीं बचा सकता — सिवाय उसी की मर्ज़ी से

  • अल्लाह के अज़ाब से कोई नहीं बचा सकता, न कोई मददगार है, न हामी
    सिवाय अल्लाह की इजाज़त के।
  • लेकिन यहां जो "कोई नहीं बचा सकता" कहा गया है,
    उसका मतलब बुत और झूठे ख़ुदा हैं — जिन पर मشرिकीन भरोसा करते थे।

📖 अल्लाह फ़रमाता है:
"तुम्हारा दोस्त सिर्फ़ अल्लाह है, और उसका रसूल, और वो मोमिन जो नमाज़ क़ायम करते हैं..." (सूरह अल-मायदा 5:55)

  • यानी पैग़म्बर और औलिया (अल्लाह के दोस्त) की मदद, असल में अल्लाह की मदद ही है।
  • इसलिए फर्क़ साफ़ समझना ज़रूरी है:

    "अल्लाह के सिवा दोस्त" = बुत, झूठे मददगार (जिन पर अल्लाह ने लानत भेजी)
    "अल्लाह के दोस्त" = पैग़म्बर, औलिया, सालेहीन (जो अल्लाह की मर्ज़ी से मदद करते हैं)

🔑 नुक्ता:
जो अल्लाह की मर्ज़ी के ख़िलाफ़ मदद देने का दावा करे — वो ग़लत और बेअसर है।
मगर जो अल्लाह की मर्ज़ी से मदद करें, वो उसी का हिस्सा है।

Ibn-Kathir

The tafsir of Surah Baqarah verse 107 by Ibn Kathir is unavailable here.
Please refer to Surah Baqarah ayat 107 which provides the complete commentary from verse 106 through 107.

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