Quran Quote  : 

कुरान मजीद-2:272 सुरा हिंदी अनुवाद, लिप्यंतरण और तफ़सीर (तफ़सीर).

۞لَّيۡسَ عَلَيۡكَ هُدَىٰهُمۡ وَلَٰكِنَّ ٱللَّهَ يَهۡدِي مَن يَشَآءُۗ وَمَا تُنفِقُواْ مِنۡ خَيۡرٖ فَلِأَنفُسِكُمۡۚ وَمَا تُنفِقُونَ إِلَّا ٱبۡتِغَآءَ وَجۡهِ ٱللَّهِۚ وَمَا تُنفِقُواْ مِنۡ خَيۡرٖ يُوَفَّ إِلَيۡكُمۡ وَأَنتُمۡ لَا تُظۡلَمُونَ

लिप्यंतरण:( Laisa 'alaika hudaahum wa laakinnal laaha yahdee mai yashaaa'; wa maa tunfiqoo min khairin fali anfusikum; wa maa tunfiqoona illab tighaaa'a wajhil laah; wa maa tunfiqoo min khairiny yuwaffa ilaikum wa antum laa tuzlamoon )

272. (ऐ नबी!) लोगों को हिदायत देना तुम्हारी ज़िम्मेदारी नहीं है [715], बल्कि अल्लाह जिसे चाहता है हिदायत देता है [716]। और जो कुछ भी तुम ख़र्च करते हो, वो तो तुम्हारे ही फ़ायदे के लिए है [717]। और तुम्हें सिर्फ़ अल्लाह की रज़ा (ख़ुशी) के लिए ही ख़र्च करना चाहिए [718]। और जो कुछ भी तुम अच्छा ख़र्च करते हो, उसका पूरा बदला तुम्हें मिलेगा और तुम्हारे साथ ज़रा भी ज़ुल्म नहीं होगा [719]।

सूरा आयत 272 तफ़सीर (टिप्पणी)



  • मुफ़्ती अहमद यार खान

[715] हिदायत देना नबी की नहीं, अल्लाह की जिम्मेदारी है

अल्लाह फ़रमाता है:

"लोगों को हिदायत देना तुम्हारी ज़िम्मेदारी नहीं..."

यानी:

  • नबी ﷺ का काम है तबलीग़ करना (पहुंचाना),
  • हिदायत देना अल्लाह का काम है।

👉 इससे हमें सीख मिलती है कि:

  • अगर कोई बात मान न ले, तो हमें मायूस नहीं होना चाहिए, क्योंकि राह दिखाना अल्लाह के हाथ में है।

🔸 जैसे सूरज की रौशनी सब पर पड़ती है, पर हर कोई आँख खोलकर न देखे तो क़सूर सूरज का नहीं — ऐसे ही नबी की बात न मानने वाला ख़ुद ज़िम्मेदार है।

[716] हिदायत अल्लाह की मर्ज़ी से मिलती है

यह बात बताती है:

  • असली हिदायत सिर्फ़ उन्हीं को मिलती है जिन्हें अल्लाह पसंद करता है।
  • रिश्तेदारी या मोहब्बत से हिदायत नहीं मिलती,
    जैसे कि नबी ﷺ के चाचा अबू तालिब ने आख़िर तक ईमान नहीं लाया।

💡 अल्लाह सब को रोज़ी देता है, सब से मोहब्बत करता है — लेकिन ईमान और हिदायत सिर्फ़ उनको मिलती है जो दिल से तलाश करें।

[717] जो दान करते हो, वो तुम्हारे लिए ही है

"तुम जो भी अच्छा खर्च करते हो, वो तुम्हारे ही लिए है।"

इसका मतलब:

  • जब तुम दान करते हो, किसी की मदद करते हो, तो दरअसल ख़ुद अपने लिए ही भलाई जमा करते हो।
  • ग़रीब को देना उस पर एहसान नहीं, बल्कि तुम्हारे लिए आख़िरत की तैयारी है।

🟢 इसलिए:

  • बेहतर माल से दो,
  • अहंकार मत करो, और
  • मुक़ाबले में नहीं, इख़लास से दो।

[718] नीतियाँ सिर्फ़ अल्लाह की रज़ा के लिए हों

"खर्च सिर्फ़ अल्लाह की रज़ा के लिए होना चाहिए।"

यानी:

  • दान या मदद में रियाकारी (दिखावा) या नाम कमाने का इरादा नहीं होना चाहिए।
  • चाहे किसी बुज़ुर्ग, औलिया या मरहूम के नाम पर दो, लेकिन नियत सिर्फ़ अल्लाह की ख़ुशी हो।

🔹 हज़रत सअद (रज़ि.अ) ने एक कुआँ बनवाया और कहा:

"इसका सवाब मेरी माँ को पहुँचे।"

👉 इसका मतलब: सवाब पहुंचाना जायज़ है, लेकिन अमल अल्लाह के लिए हो।

[719] अल्लाह तुम्हारा हक़ कभी नहीं मारेगा

"तुम जो अच्छा खर्च करते हो, उसका पूरा बदला मिलेगा और कोई ज़ुल्म नहीं होगा।"

अल्लाह वादा करता है:

  • तुम्हारी मेहनत ज़ाया नहीं जाएगी।
  • तुम्हें पूरा-पूरा सवाब मिलेगा।
  • ना कमी होगी, ना बेवजह रोका जाएगा।

💡 और याद रखो — अल्लाह का इनसाफ़ बेहद अज़ीम है।
बल्कि ज़्यादा सवाब देना — ये अल्लाह की रहमत है।

नतीजा:

  • दान करो, लेकिन अल्लाह की रज़ा के लिए।
  • किसी की हिदायत हमारे हाथ में नहीं, लेकिन हमारा इख़लास हमारे हाथ में है।
  • और याद रखो — जो कुछ भी दोगे, उसका सवाब तुम ही पाओगे — पूरा, बगैर किसी ज़ुल्म के।

Ibn-Kathir

The tafsir of Surah Baqarah verse 271 by Ibn Kathir is unavailable here.
Please refer to Surah Baqarah ayat 270 which provides the complete commentary from verse 270 through 271.

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