Quran Quote  : 

कुरान मजीद-2:193 सुरा हिंदी अनुवाद, लिप्यंतरण और तफ़सीर (तफ़सीर).

وَقَٰتِلُوهُمۡ حَتَّىٰ لَا تَكُونَ فِتۡنَةٞ وَيَكُونَ ٱلدِّينُ لِلَّهِۖ فَإِنِ ٱنتَهَوۡاْ فَلَا عُدۡوَٰنَ إِلَّا عَلَى ٱلظَّـٰلِمِينَ

लिप्यंतरण:( Wa qaatiloohum hatta laa takoona fitnatunw wa yakoonad deenu lillaahi fa-inin tahaw falaa 'udwaana illaa 'alaz zaalimeen )

193. और उनसे लड़ो जब तक कि फ़ितना (ज़ुल्म और रोक-टोक) बाक़ी न रहे [439], और दीन (इबादत) सिर्फ़ अल्लाह ही के लिए हो जाए। फिर अगर वे बाज़ आ जाएँ, तो (किसी तरह की) दुश्मनी नहीं होनी चाहिए, सिवाय ज़ालिमों के ख़िलाफ़ [441]।

सूरा आयत 193 तफ़सीर (टिप्पणी)



  • मुफ़्ती अहमद यार खान

[439] जिहाद का मक़सद

जुल्म और रुकावट को खत्म करना:

  • इस आयत में अल्लाह तआला ने जिहाद का मकसद साफ़ किया है:
    यह इसलिए नहीं कि काफ़िरों का सफाया कर दिया जाए,
    बल्कि इसलिए कि फितना (यानी ज़ुल्म, रोक-टोक और दीन की राह में रुकावट) खत्म हो जाए।
  • जब तक अल्लाह की इबादत करने की आज़ादी न मिल जाए,
    और कोई मज़हबी जबर न रह जाए — तब तक जिहाद जारी रखा जा सकता है।

[440] सिर्फ़ अल्लाह की इबादत क़ायम हो

ताकतवर ज़ुल्म का ख़ात्मा:

  • इस आयत का मतलब यह भी है कि ऐसे ताक़तवर ज़ालिमों को हटाया जाए
    जो लोगों को अल्लाह की इबादत से रोकते हैं, ताकि सिर्फ अल्लाह की बंदगी खुलेआम हो सके।
  • मक्का मुक़र्रमा, जो अल्लाह का पाक घर है, वहाँ सिर्फ़ मोमिनों को रहने की इजाज़त है,
    ताकि वहाँ की पवित्रता और अल्लाह की इबादत का निज़ाम कायम रहे।

[441] ज़ालिमों के सिवा दुश्मनी नहीं

जब दुश्मन बाज आ जाए:

  • अगर दुश्मन जंग से रुक जाए और फितना बंद कर दे,
    तो फिर उनसे लड़ाई या दुश्मनी का हुक्म नहीं है।
  • मगर ज़ालिमों के साथ सख़्ती बरतना जायज़ है —
    जैसे के लुटेरे, क़ातिल, फ़साद करने वाले, या वो जो अमन में ख़लल डालते हैं।
    इन पर शरीअत के मुताबिक़ सज़ा दी जा सकती है

📚 मुख़्तसर समझ:

  • इस्लाम में जिहाद का मक़सद तबाही नहीं, बल्कि ज़ुल्म का ख़ात्मा और अल्लाह की इबादत की आज़ादी है।
  • अगर ज़ालिम बाज आ जाएँ, तो इस्लाम अमन और माफ़ी को तर्जीह देता है।
  • लेकिन जो ज़ालिम और फ़सादी बने रहें — उनके लिए सख़्ती रखी जाती है,
    ताकि समाज में अमन और इंसाफ़ कायम रह सके

Ibn-Kathir

The tafsir of Surah Baqarah verse 192 by Ibn Kathir is unavailable here.
Please refer to Surah Baqarah ayat 190 which provides the complete commentary from verse 190 through 193.

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