लिप्यंतरण:( Yukhaadi'oonal laaha wallazeena aamanoo wa maa yakhda'oona illaaa anfusahum wa maa yash'uroon. )
9. वो लोग अल्लाह [25] और ईमान वालों को धोखा देने की कोशिश करते हैं, लेकिन दरअसल वो सिर्फ़ अपने आप को धोखा देते हैं और उन्हें इसका एहसास तक नहीं होता।
आयत 9 (सूरह अल-बक़रह) — तफ़सीर और समझ
9. वो लोग अल्लाह [25] और ईमान वालों को धोखा देने की कोशिश करते हैं, लेकिन दरअसल वो सिर्फ़ अपने आप को धोखा देते हैं और उन्हें इसका एहसास तक नहीं होता।
➡️ "वो लोग अल्लाह और ईमान वालों को धोखा देने की कोशिश करते हैं..."
यह आयत मुनाफिक़ों (दिखावे के मुसलमानों) के बारे में है।
ये लोग:
➡️ "असल में वो सिर्फ़ खुद को धोखा देते हैं..."
लेकिन हक़ीक़त में:
👉 जिसे वो दूसरों को छल समझते हैं, वह असल में खुद उनके लिए नुकसानदायक होता है।
➡️ "और उन्हें इसका एहसास भी नहीं होता..."
इन मुनाफ़िक़ों की सबसे बड़ी मुसीबत यही है —
कि वो अपनी असल हालत को समझते ही नहीं।
उन्हें लगता है कि वो बहुत चालाक हैं, लेकिन वो सबसे ज़्यादा धोखा खुद को ही दे रहे हैं।
सीख:
The tafsir of Surah Baqarah verse 9 by Ibn Kathir is unavailable here.
Please refer to Surah Baqarah ayat 1 which provides the complete commentary from verse 8 through 9.
सूरा आयत 9 तफ़सीर (टिप्पणी)