लिप्यंतरण:( Wallazeena kafaroo wa kaz zabooo bi aayaatinaa ulaaa'ika Ashaabun Naari hum feehaa khaalidoon )
[39] और जो लोग इनकार करेंगे और हमारी आयतों को झुटलाएँगे, वे जहन्नम वाले होंगे, और हमेशा उसी में रहेंगे। [77]
इस आयत में अल्लाह तआला ने उस समूह का अंजाम बयान किया है जो:
➤ ईमान नहीं लाता,
➤ और अल्लाह की निशानियों को झुटलाता है,
➤ जबकि उन्हें नबी की तरफ़ से साफ़ हिदायत मिल चुकी होती है।
✅ ऐसे लोग जहन्नम के हक़दार हैं और हमेशा उसी में रहेंगे।
यह सज़ा हमेशा की है, लेकिन यह सख्त हुक्म उन पर लागू होता है जिन्होंने:
➡️ लेकिन जो लोग ऐसे दौर में थे जहाँ तक नबी की दावत नहीं पहुँची, जैसे:
उन पर यह हुक्म नहीं लागू होता। उनके लिए सिर्फ़ तौहीद (अल्लाह की एकता) को मानना ही नजात का ज़रिया है।
📌 इस आयत की रोशनी में उलमा ने यह हुक्म निकाला कि:
हज़रत रसूलुल्लाह ﷺ के वालिदैन, जो नुबूवत से पहले के दौर में थे,
उन्हें हिदायत नहीं पहुँची थी, और वे मुवह्हिद (एक अल्लाह को मानने वाले) थे।
इसलिए वे बरी (गुनाहों से पाक) और माफ़ किए गए हैं।
✅ सबक़:
अल्लाह का इंसाफ़ बहुत ही दयानतदार और हिकमत वाला है।
किसी पर सज़ा उसी वक़्त होती है जब:
➤ अल्लाह हिदायत की क़दर करने वालों को सुकून और नजात देता है,
और ज़िद्दी इनकार करने वालों को जहन्नम का अंजाम।
The tafsir of Surah Baqarah verse 39 by Ibn Kathir is unavailable here.
Please refer to Surah Baqarah ayat 38 which provides the complete commentary from verse 38 through 39.
सूरा आयत 39 तफ़सीर (टिप्पणी)