लिप्यंतरण:( Wattaqoo yawman turja'oona feehi ilal laahi summa tuwaffaa kullu nafsim maa kasabat wa hum laa yuzlamoon )
281. और उस दिन से डरो जब तुम सबको अल्लाह की ओर लौटाया जाएगा [746]। फिर हर एक आत्मा को उसके कर्मों का पूरा बदला दिया जाएगा। और उन पर कोई अन्याय नहीं किया जाएगा [747]।
✅ [746] दूसरों को माफ़ करो ताकि तुम्हें माफ़ किया जाए
यह आयत हमें अनिवार्य वापसी के दिन की याद दिलाती है — क़यामत का दिन, जब हर व्यक्ति को हिसाब के लिए अल्लाह के सामने लाया जाएगा। इसका गहरा मतलब यह है: जैसे तुम अपनी कमियों के लिए अल्लाह की रहम और माफी की उम्मीद करते हो, वैसे ही तुम्हें भी अपने बेहाल कर्जदार को माफ़ करना चाहिए। हम सब अल्लाह के सामने अपने गुनाहों, कमियों और अधूरे फर्ज़ों के कारण कर्जदार हैं। इसलिए: दूसरों को माफ़ करो ताकि तुम्हें भी माफ़ किया जाए। यह आयत न केवल जवाबदेही सिखाती है, बल्कि करुणा और गहरी आध्यात्मिक नम्रता को भी बढ़ावा देती है।
✅ [747] पूर्ण न्याय बिना अन्याय के
यह भाग आश्वस्त करता है कि क़यामत के दिन: हर आत्मा को उसके कर्मों का पूरा बदला मिलेगा — न ज्यादा, न कम। किसी पर भी कोई अन्याय नहीं किया जाएगा। इसका मतलब:
📜 हज़रत अब्दुल्लाह इब्न अब्बास (रज़ि.) के अनुसार, यह कुरआन की अंतिम आयत थी, जिसके बाद पैगंबर ﷺ ने 21, 9, या 7 दिन और जीवन बिताया। इसका स्थान और संदेश एक सार्वभौमिक अंतिम चेतावनी है:
आख़िरत के लिए ईमान, न्याय, और सच्चाई के साथ तैयारी करो — क्योंकि अल्लाह न्यायप्रिय है, और हर कर्म मायने रखता है।
The tafsir of Surah Baqarah verse 280 by Ibn Kathir is unavailable here.
Please refer to Surah Baqarah ayat 278 which provides the complete commentary from verse 278 through 281.
सूरा आयत 281 तफ़सीर (टिप्पणी)