लिप्यंतरण:( Wa iz yarfa'u Ibraaheemul qawaa'ida minal Baitiwa Ismaa'eelu Rabbanaa taqabbal minnaa innaka Antas Samee'ul Aleem )
127. और (याद करो) जब इब्राहीम और इस्माईल काबा की बुनियाद रख रहे थे [257], (दुआ करते हुए), "हे हमारे रब! इसे हमसे स्वीकार कर। निश्चय ही, तू सब सुनने वाला, सब जानने वाला है [258]।"
📖 सूरह अल-बक़रह – आयत 127
"और (याद करो) जब इब्राहीम और इस्माईल काबा की बुनियाद रख रहे थे [257], (दुआ करते हुए), 'हे हमारे रब! इसे हमसे स्वीकार कर। निश्चय ही, तू सब सुनने वाला, सब जानने वाला है [258]।'"
✅ [257] मस्जिदों का निर्माण पवित्रता और दुआ के साथ
यह आयत बताती है कि हज़रत इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) और हज़रत इस्माईल (अलैहिस्सलाम) काबा की बुनियाद रखते हुए लगातार दुआ कर रहे थे, अल्लाह से अपनी मेहनत की कबूलियत माँग रहे थे।
इससे हमें सीखने को मिलता है:
📌 यह आयत अक्सर इस धार्मिक निर्माण कार्य के दौरान आध्यात्मिक शुद्धता बनाए रखने की परंपरा के समर्थन में उद्धृत की जाती है।
✅ [258] काबा और मक्का – स्थिरता और दिव्य जवाब
यह आयत अल्लाह के घर का जिक्र करते हुए मक्का की स्थायी पवित्रता का भी संकेत देती है।
मुख्य सीख:
🕊️ अल्लाह अस-समी‘ (सब सुनने वाले) और अल-‘अलीम (सब जानने वाले) हैं—वह सबसे नाज़ुक दुआओं को भी सुनता है और गहरे इरादों को जानता है।
`O our Lord ! Accept (this service) from us, Verily, You are the Hearing, the Knowing.’ (2.127).”’ Hence, they were building the House, part by part, going around it and saying,
सूरा आयत 127 तफ़सीर (टिप्पणी)