Quran Quote  : 

कुरान मजीद-2:269 सुरा हिंदी अनुवाद, लिप्यंतरण और तफ़सीर (तफ़सीर).

يُؤۡتِي ٱلۡحِكۡمَةَ مَن يَشَآءُۚ وَمَن يُؤۡتَ ٱلۡحِكۡمَةَ فَقَدۡ أُوتِيَ خَيۡرٗا كَثِيرٗاۗ وَمَا يَذَّكَّرُ إِلَّآ أُوْلُواْ ٱلۡأَلۡبَٰبِ

लिप्यंतरण:( Yu'til Hikmata mai yashaaa'; wa mai yu'tal Hikmata faqad ootiya khairan kaseeraa; wa maa yazzakkaru illaaa ulul albaab )

269. अल्लाह जिसे चाहता है, उसे हिकमत (समझदारी और दीन की अक़्ल) अता करता है [709], और जिसे हिकमत दी गई, उसे तो बहुत बड़ी नेमत मिल गई [710]। और नसीहत (सीख) तो वही लोग लेते हैं जो अक़्ल वाले होते हैं।

सूरा आयत 269 तफ़सीर (टिप्पणी)



  • मुफ़्ती अहमद यार खान

[709] हिकमत का मतलब — दीन की समझ और सही सोच

यहाँ "हिकमत" से मुराद है:

  • कुरआन और हदीस की सही समझ,
  • दीन को सही तरीक़े से जानना और उस पर अमल करना,
  • और ज़िंदगी के फैसले अल्लाह के हुक्मों के मुताबिक़ करना।

➡️ यह एक ख़ास नेमत है, जो हर किसी को किताबें पढ़कर नहीं मिलती, बल्कि अल्लाह जिसे चाहता है, उसे देता है।

जैसे एक रेडियो को सही फ़्रीक्वेंसी पर ट्यून किया जाए तभी आवाज़ साफ़ सुनाई देती है — उसी तरह इंसान को अंदर से तैयार होना चाहिए कि वो क़ुरआन की बातों को समझ सके
ये अल्लाह की रहमत से होता है।

[710] हिकमत — सबसे बड़ी दौलत

अल्लाह फ़रमाते हैं कि "जिसे हिकमत दी गई, उसे बहुत बड़ी नेमत मिली।"

यहाँ हमें ये समझाया गया:

  • इल्म और समझदारी की नेमत माल, ताक़त, हुकूमत — सब से बेहतर है।
  • एक अक़्लमंद और दीनदार इंसान पूरी उम्मत को फ़ायदा पहुँचा सकता है।
  • यह सदक़ा-ए-जारिया (चलती रहने वाली नेकी) की सबसे ऊँची शक्ल है —
    यानी किसी को सही इल्म सिखाना, जो आगे भी लोगों तक पहुंचे।

➡️ हज़रत मुहम्मद ﷺ सबसे ज़्यादा इल्म रखने वाले थे, और उन्होंने फ़रमाया:

"मुझे हर चीज़ का साफ़ इल्म दिया गया।"

इसलिए, जो इंसान दूसरों को दीन की बातें सिखाता है, वो सिर्फ़ इल्म नहीं देता, बल्कि अल्लाह की सबसे बड़ी नेमत बाँटता है।

नतीजा:
जो इंसान अक़्ल और समझ रखता है, वो ही इन बातों से सबक लेता है
बाकी लोग चाहे कितना भी पढ़ें, अगर दिल में नीयत और अक़्ल नहीं, तो नसीहत असर नहीं करती।

Ibn-Kathir

The tafsir of Surah Baqarah verse 268 by Ibn Kathir is unavailable here.
Please refer to Surah Baqarah ayat 267 which provides the complete commentary from verse 267 through 269.

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