लिप्यंतरण:( Sayaqoolus sufahaaa'u minan naasi maa wallaahum 'an Qiblatihimul latee kaanoo 'alaihaa; qul lillaahil mashriqu walmaghrib; yahdee mai yashaaa'u ilaa Siraatim Mustaqeem )
142.बेवकूफ़ [285] लोग कहेंगे [286]: "क्या चीज़ है जिसने इन्हें उस क़िब्ले [287] से फेर दिया जिसकी तरफ़ ये पहले रुख़ करते थे?" कह दो (ऐ मुहम्मद): "पूरब और पश्चिम — सब अल्लाह ही का है [288]; जो चाहे उसे सीधी राह की हिदायत देता है।"
📖 सूरह अल-बाक़रा – आयत 142 की व्याख्या
"बेवकूफ़ [285] लोग कहेंगे [286]: 'क्या चीज़ है जिसने इन्हें उस क़िब्ले [287] से फेर दिया जिसकी तरफ़ ये पहले रुख़ करते थे?' कह दो (ऐ मुहम्मद): 'पूरब और पश्चिम — सब अल्लाह ही का है [288]; जो चाहे उसे सीधी राह की हिदायत देता है।'"
✅ [285] बेवकूफ़ों की आपत्तियाँ: यहूद, मूर्तिपूजक और पाखंडी
यह आयत यहूद, मूर्तिपूजकों और पाखंडियों की ओर इशारा करती है, जो पैगंबर ﷺ का मज़ाक उड़ाते थे और क़िबले के बदलाव पर आपत्ति जताते थे। वे इस अल्लाह द्वारा निर्धारित बदलाव को स्वीकार करने को तैयार नहीं थे।
तोरा और अन्य पूर्वग्रंथों में यह भविष्यवाणी हो चुकी थी कि आखिरी पैगंबर दो क़िबलों वाले होंगे।
📌 इसलिए क़िबला मक्का से यरुशलेम से बदलना पैगंबरी का सबूत था, संदेह का कारण नहीं।
फिर भी ये दुष्ट आपत्ति करने वाले पैगंबर के मिशन को कमजोर करने की कोशिश करते थे।
✅ [286] क़िबले का ऐतिहासिक सचाई: पहले और बाद में
महत्वपूर्ण ऐतिहासिक बिंदु:
काबा आदम (अस) से लेकर मूसा (अस) तक असली क़िबला था।
बैतुल मक़्दिस (यरुशलेम) मूसा (अस) से लेकर ईसा (अस) तक क़िबला था।
प्रारंभिक इस्लाम में मुसलमान यरुशलेम की ओर मुंह करते थे, लेकिन क़िबला बदलने का अल्लाह का आदेश आया:
📆 रमज़ान की 25 तारीख, 2 हिजरी में, ज़ुहर की नमाज़ के वक्त मस्जिद क़िबलतैन में, हिजरत के लगभग 17 महीने बाद।
अल्लाह ने इस आपत्ति का जिक्र किया ताकि:
आपत्ति करने वालों की तुच्छता उजागर हो और दिखाया जा सके कि ये तर्क कितने मूर्खतापूर्ण हैं, भले ही आपत्ति करने वाले खुद को चालाक समझते हों।
✅ [287] बैतुल मक़्दिस से काबा की ओर क़िबला परिवर्तन पर आपत्ति
यहूद ने इस दिशा परिवर्तन पर आपत्ति जताई, पैगंबर ﷺ और इस्लाम की वैधता पर सवाल उठाए।
📌 इससे हमें यह सीख मिलती है कि:
बिना अल्लाह की हिकमत को समझे किए गए अनावश्यक विरोध ज्ञान की कमी दर्शाते हैं।
दुनियावी मामलों में बुद्धिमान होने वाले भी अगर धर्म में बिना ठोस वजह के आपत्ति करते हैं तो अल्लाह उन्हें "बेवकूफ़" कहता है।
✅ [288] असली इबादत अल्लाह के लिए है, दिशाओं के लिए नहीं
मुसलमानों का जवाब गरिमामय और तौहीद से भरा है: "हम पूरब या पश्चिम की पूजा नहीं करते। हम अल्लाह के आदेश का पालन करते हैं।"
मुख्य बात: नमाज़ में क़िबला स्थानिक दिशा नहीं, बल्कि आदेश पालन है।
अल्लाह के ही हैं पूरब और पश्चिम दोनों, और वह पूरी स्वतंत्रता रखते हैं कि वह क़िबला कहीं भी निर्धारित करें।
📌 असली सीधी राह अल्लाह की हिदायत का पालन करना है, चाहे वह हमें कहीं भी मुंह करने को कहें।
The tafsir of Surah Baqarah verse 141 by Ibn Kathir is unavailable here.
Please refer to Surah Baqarah ayat 139 which provides the complete commentary from verse 139 through 141.
सूरा आयत 142 तफ़सीर (टिप्पणी)