Quran Quote  : 

कुरान मजीद-2:226 सुरा हिंदी अनुवाद, लिप्यंतरण और तफ़सीर (तफ़सीर).

لِّلَّذِينَ يُؤۡلُونَ مِن نِّسَآئِهِمۡ تَرَبُّصُ أَرۡبَعَةِ أَشۡهُرٖۖ فَإِن فَآءُو فَإِنَّ ٱللَّهَ غَفُورٞ رَّحِيمٞ

लिप्यंतरण:( Lillazeena yu'loona min nisaaa'ihim tarabbusu arba'ati ashhurin fain faaa'oo fa innal laaha Ghafoorur Raheem )

226. जो लोग अपनी पत्नियों से संबंध न बनाने की क़स्म खाते हैं [537], उन्हें चार महीने का इंतजार करना चाहिए। फिर अगर वे सामान्य (संबंध) पर वापस लौट आते हैं, तो यकीनन, अल्लाह बहुत माफ़ करने वाला, अति दयालु है [538]।

सूरा आयत 226 तफ़सीर (टिप्पणी)



  • मुफ़्ती अहमद यार खान

[537] तलाक की क़स्म और 'इला' का अवधारणा

यह आयत उस प्रक्रिया का उल्लेख करती है जिसे 'इला' कहा जाता है, जिसमें पति अपनी पत्नी से शारीरिक संबंध बनाने की क़स्म खाता है।

  • क़ुरआन ने इस प्रकार की क़स्म के लिए अधिकतम चार महीने का समय निर्धारित किया है।
  • इस चार महीने के समय में, पति को सोचने और पुनर्विचार करने का अवसर मिलता है, ताकि किसी भी तरह का शारीरिक या मानसिक नुकसान पत्नी को न पहुंचे। यह अवकाश उनके रिश्ते को सुधारने और पुनः स्थापित करने के लिए है।

मूल विचार:

  • 'इला' एक स्थिति है जब पति अपनी पत्नी से शारीरिक संबंध न बनाने की क़स्म खाता है, और क़ुरआन इस क़स्म की अवधि को चार महीने तक सीमित करता है।

[538] सुलह पर माफ़ी और अल्लाह की दया

यदि पति चार महीने के भीतर अपनी पत्नी से संबंधों को पुनः स्थापित कर लेता है, तो अल्लाह उस क़स्म को माफ़ कर देता है और इसे सुलह माना जाता है।

  • इस बात से हमें यह शिक्षा मिलती है कि अल्लाह उन लोगों के लिए माफ़ी और दया प्रदान करता है जो अपने व्यवहार को सुधारते हैं और ग़लतियाँ करने के बाद तौबा करते हैं।
  • यह आयत यह भी स्पष्ट करती है कि इस क़स्म को लंबे समय तक बनाए रखने या रिश्ते में कटुता और अलगाव को बढ़ाने का उद्देश्य नहीं है, बल्कि उसका उद्देश्य पति-पत्नी के बीच के रिश्ते को सुधारना और सुलह करना है।

तफ़सीर:

  • इस आयत से यह स्पष्ट होता है कि जब एक पति अपनी पत्नी से संबंधों को लेकर क़स्म खाता है, तो उसे चार महीने का समय दिया जाता है ताकि वह पुनः सोच सके और अपने फैसले पर पुनर्विचार कर सके।
  • अगर चार महीने के भीतर वह सुलह करता है और रिश्ते को पुनः स्थापित करता है, तो अल्लाह उसकी ग़लती को माफ़ करता है और उसे अपने अनुग्रह से आशीर्वादित करता है।

सारांश:
यह आयत एक व्यक्ति को यह सिखाती है कि ग़लतियों के बावजूद अगर वह अपना रवैया सुधारता है और पुनः अच्छे रिश्ते की ओर लौटता है, तो अल्लाह उसकी माफ़ी करता है। यह रिश्तों को सुधारने और नफरतों को खत्म करने की दिशा में प्रेरित करती है।

Ibn-Kathir

The tafsir of Surah Baqarah verse 225 by Ibn Kathir is unavailable here.
Please refer to Surah Baqarah ayat 224 which provides the complete commentary from verse 224 through 225.

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