लिप्यंतरण:( Wa maa kaana qawlahum illaa an qaaloo Rabbanagh fir lanaa zunoobanaa wa israafanaa feee amrinaa wa sabbit aqdaamanaa wansurnaa 'alal qawmil kaafireen )
और उन्होंने इससे अधिक कुछ नहीं कहा [316]: “ऐ हमारे रब! हमारे गुनाहों को माफ़ फ़रमा दे, और हमारे मामलों में जो हमसे हद से बढ़ गया उसे भी, और हमारे क़दमों को सुदृढ़ बना दे [317], और इन इनकार करने वालों के मुक़ाबले में हमारी मदद फ़रमा” [318]।
यहाँ "उन्होंने" से मुराद नबी और अल्लाह वाले लोग हैं, जो गुनाहों से पाक होते हैं। इसके बावजूद वे माफ़ी मांगते हैं, न कि किसी असली गुनाह की वजह से, बल्कि गहरी आजिज़ी और इन्किसारी के कारण। यही तक़वा की ख़ूबसूरती है — जब निहायत नेक लोग भी अपने आप को गुनहगार समझते हैं, जबकि अल्लाह उन्हें पाक और नेक फ़रमाता है।
इस दुआ में उन्होंने अल्लाह से दुआ की कि हमारे क़दम मज़बूत बना दे, यानी हमें हिम्मत और ताक़त दे कि हम कुफ्फ़ार का डटकर सामना कर सकें। समझ लेना चाहिए कि हक़ीक़ी इस्तिक़ामत सिर्फ़ अल्लाह के ख़ास फ़ज़्ल से मिलती है, न कि हथियारों या संख्या बल से।
इस जबरदस्त दुआ से कई अहम सबक मिलते हैं:
The tafsir of Surah Imran verse 147 by Ibn Kathir is unavailable here.
Please refer to Surah Imran ayat 144 which provides the complete commentary from verse 144 through 148.

सूरा आयत 147 तफ़सीर (टिप्पणी)