Quran Quote  : 

कुरान मजीद-3:161 सुरा हिंदी अनुवाद, लिप्यंतरण और तफ़सीर (तफ़सीर).

وَمَا كَانَ لِنَبِيٍّ أَن يَغُلَّۚ وَمَن يَغۡلُلۡ يَأۡتِ بِمَا غَلَّ يَوۡمَ ٱلۡقِيَٰمَةِۚ ثُمَّ تُوَفَّىٰ كُلُّ نَفۡسٖ مَّا كَسَبَتۡ وَهُمۡ لَا يُظۡلَمُونَ

लिप्यंतरण:( Wa maa kaana li Nabiyyin ai yaghull; wa mai yaghlul ya'tibimaa ghalla Yawmal Qiyaamah; summa tuwaffaa kullu nafsim maa kasabat wa hum laa yuzlamoon )

किसी नबी के बारे में यह गुमान नहीं किया जा सकता कि वह (ग़नीमत) में से कुछ छुपा ले [364]। और जो कोई ऐसा करेगा, क़ियामत के दिन उसे सामने लाया जाएगा। फिर हर जान को उसके कमाए का पूरा बदला दिया जाएगा [365], और उन पर कोई ज़ुल्म नहीं किया जाएगा [366]।

सूरा आयत 161 तफ़सीर (टिप्पणी)



  • मुफ़्ती अहमद यार खान

📖 सूरा आले-इमरान – आयत 161 की तफ़्सीर

 

✅ [364] नबी ख़यानत से पाक होते हैं

"कुछ छुपा लेना" से मुराद ग़नीमत के माल में ख़यानत करना है।
वजह-ए-नुज़ूल: एक जंग में ग़नीमत से एक चादर गुम हो गई थी।
मुनाफिक़ों ने इल्ज़ाम लगाने की कोशिश की कि रसूलुल्लाह ﷺ ने उसे रख लिया होगा।
अल्लाह ने इस इल्ज़ाम को रद्द करते हुए ख़ुद यह आयत नाज़िल फ़रमाई।

इससे चार अहम बातें निकलती हैं:

  • ग़नीमत की तक़सीम से पहले उसमें ख़यानत करना बहुत बड़ा जुर्म है।
  • अंबिया अज़्म (नबीगण) मासूम होते हैं — जैसे अंधेरा और रौशनी साथ नहीं रह सकते,
    वैसे ही गुनाह और नबुव्वत एक साथ नहीं हो सकते।
  • नबी पर शक करना मुनाफिक़ों की आदत है, और ऐसा शक अक्सर कुफ्र तक ले जाता है।
  • अल्लाह ख़ुद अपने नबियों की हिफ़ाज़त करता है, और झूठे इल्ज़ामों से उन्हें पाक व साफ़ कर देता है।

✅ [365] नबी रहनुमा होते हैं, गुनहगार नहीं

अंबिया का काम लोगों को गुमराही से निकाल कर रास्ते पर लाना होता है।
अगर वे खुद गुनाह करें, तो लोगों का रहनुमा कौन बनेगा?
इसलिए ख़यानत या धोखा नबी के लिए मुमकिन ही नहीं।
उनकी ज़िम्मेदारी अख़्लाक़ी और रूहानी बुलंदी की होती है।

✅ [366] अल्लाह का इंसाफ़ मुकम्मल होता है

"उन पर कोई ज़ुल्म नहीं किया जाएगा" का मतलब है:

  • न किसी की नेकी का सिला घटाया जाएगा,
  • न किसी की सज़ा हद से ज़्यादा दी जाएगी,
  • और न किसी को बिना गुनाह के सज़ा दी जाएगी।
    हर जान को वही मिलेगा जो उसने कमाया — पूरा, बराबर, और इंसाफ़ के साथ।

Ibn-Kathir

The tafsir of Surah Imran verse 161 by Ibn Kathir is unavailable here.
Please refer to Surah Imran ayat 159 which provides the complete commentary from verse 159 through 164.

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