लिप्यंतरण:( Qul atee'ul laaha war Rasoola fa in tawallaw fa innal laaha laa yuhibbul kaafireen )
32. "कह दो (हे मुहम्मद): अल्लाह और उसके रसूल की आज्ञा मानो [70]। अगर वो मुँह फेर लें तो अल्लाह काफ़िरों को पसंद नहीं करता।"
👉 इस आयत में साफ़ कहा गया है कि अल्लाह और उसके नबी की पूरी ताबेअत करना जरूरी है।
👉 जैसे कुछ साधन (माध्यम) काम खत्म होते ही छोड़े जा सकते हैं, जैसे ट्रेन गंतव्य पर पहुंच कर रुक जाती है, वैसे नबी मुहम्मद ﷺ नहीं हैं।
👉 नबी ﷺ एक ऐसी रोशनी की तरह हैं जो हमेशा जलती रहनी चाहिए, ताकि हम सही रास्ता देख सकें।
👉 अल्लाह के करीब होने के बाद भी हम नबी ﷺ की ताबेअत छोड़ नहीं सकते।
👉 जो नबी ﷺ की ताबेअत से मुँह मोड़ता है, वह काफ़िर (इनकार करने वाला) कहलाता है।
👉 अल्लाह ऐसी लोगों से मोहब्बत नहीं करता क्योंकि उन्होंने उसके रसूल की नकारात्मकता दिखाई है।
नतीजा:
यह आयत हमें यह समझाती है कि नबी मुहम्मद ﷺ की ताबेअत अल्लाह की ताबेअत के बराबर है और इसे छोड़ना काफ़िरी माना जाता है। इसलिए हर मुसलमान के लिए यह बहुत ज़रूरी है कि वह अल्लाह और उसके रसूल की पूरी इमानदारी और लगन से पालना करे।
The tafsir of Surah Imran verse 32 by Ibn Kathir is unavailable here.
Please refer to Surah Imran ayat 31 which provides the complete commentary from verse 31 through 32.

सूरा आयत 32 तफ़सीर (टिप्पणी)