लिप्यंतरण:( Yawma tajidu kullu nafsim maa'amilat min khairim muhdaranw wa maa 'amilat min sooo'in tawaddu law anna bainahaa wa bainahooo amadam ba'eedaa; wa yuhazzirukumul laahu nafsah; wallaahu ra'oofum bil'ibaad )
30. "[सावधान रहो उस दिन से] जब हर शख़्स अपने अच्छे अमल और अपने बुरे अमल दोनों को देखेगा [66]। और वो चाहेगा कि उसके और उसके बुरे अमल के बीच बहुत दूरियाँ होतीं [67]। अल्लाह तुम्हें अपने सज़ा से डराता है, और अल्लाह अपने बन्दों पर बहुत मेहरबान है।"
👉 क़यामत के दिन, हर इंसान के सारे अच्छे और बुरे काम उसकी नज़र के सामने होंगे।
👉 अच्छे काम खूबसूरत और प्यारे रूप में दिखेंगे, और बुरे काम डरावने या घृणित (बेहद बुरे) रूप में।
👉 जैसे हदीस में बताया गया है, जो दौलत जकात दिए बिना जमा की गई हो, वो उस मालिक के सामने ज़हर भरे सांप के रूप में आएगी।
👉 इससे पता चलता है कि हम अपने अमल का हिसाब जरूर देंगे।
👉 उस दिन गुनाहगार बहुत अफ़सोस करेंगे कि काश उनके बुरे काम उनसे दूर होते।
👉 यह आयत यह भी दिखाती है कि गुनाहगारों को अपने किए पर गहरा मलाल होगा।
👉 अल्लाह हमें पहले से ही आगाह करता है कि उसके सज़ा से डरें ताकि हम बुराई से बच सकें।
👉 अल्लाह की सज़ा कड़ी है, लेकिन वह अपने बंदों पर बहुत मेहरबान भी है।
👉 इसका मतलब है कि अगर कोई ईमानदारी से तौबा करे और सुधार करे, तो अल्लाह उसकी रहमत से उसे नज़रअंदाज़ नहीं करेगा।
👉 इसलिए इंसान को हमेशा अपने अमल का हिसाब रखना चाहिए और सच्चे दिल से अल्लाह से डरते हुए अच्छा करना चाहिए।
नतीजा:
यह आयत हमें याद दिलाती है कि एक दिन हम अपने किए हुए सभी अच्छे और बुरे कामों का हिसाब देंगे। इसलिए हमें अपने दिल, सोच और अमल को हमेशा सही रास्ते पर रखना चाहिए, ताकि उस दिन हमें पछतावा न हो।
The tafsir of Surah Imran verse 30 by Ibn Kathir is unavailable here.
Please refer to Surah Imran ayat 29 which provides the complete commentary from verse 29 through 30.

सूरा आयत 30 तफ़सीर (टिप्पणी)