Quran Quote  : 

कुरान मजीद-3:27 सुरा हिंदी अनुवाद, लिप्यंतरण और तफ़सीर (तफ़सीर).

تُولِجُ ٱلَّيۡلَ فِي ٱلنَّهَارِ وَتُولِجُ ٱلنَّهَارَ فِي ٱلَّيۡلِۖ وَتُخۡرِجُ ٱلۡحَيَّ مِنَ ٱلۡمَيِّتِ وَتُخۡرِجُ ٱلۡمَيِّتَ مِنَ ٱلۡحَيِّۖ وَتَرۡزُقُ مَن تَشَآءُ بِغَيۡرِ حِسَابٖ

लिप्यंतरण:( Toolijul laila fin nahaari wa toolijun nahaara fil laili wa tukhrijul haiya minalmaiyiti wa tukhrijul maiyita minal haiyi wa tarzuqu man tashaaa'u bighari hisaab )

27."तुम रात को दिन में घुला देते हो, और दिन को रात में घुला देते हो [59]। तुम जीवित को मृत से पैदा करते हो, और मृत को जीवित से पैदा करते हो [60]। और तुम जिसे चाहते हो बिना किसी हिसाब के देते हो [61]।"

सूरा आयत 27 तफ़सीर (टिप्पणी)



  • मुफ़्ती अहमद यार खान

[59] "रात को दिन में घुला देना" — दिन-रात का अदला-बदली

👉 अल्लाह कुदरत के ज़रिए दिन और रात को बदलता रहता है।
👉 जैसे सर्दियों में दिन कम और रात ज़्यादा होती है, गर्मियों में रात कम और दिन ज़्यादा होता है।
👉 यह तबीअती बदलाव अल्लाह की मर्ज़ी से होते हैं।
👉 दीन के नज़रिया से भी, मुसलमानों का राज़ गैर-मुसलमानों पर दिन के उजाले की तरह है, और गैर-मुसलमानों की हुकूमत मुसलमानों पर रात के अंधेरे जैसी।

[60] "जीवित को मृत से पैदा करना और मृत को जीवित से" — जीवन और मौत की कुदरत

👉 अल्लाह ज़िंदगी और मौत दोनों की मालिक है।
👉 जैसे इंसान को मरे हुए कोशिकाओं (dead cells) से जीवन मिलता है, वैसे ही मौत भी ज़िंदगी से आती है।
👉 ये केवल शारीरिक पैदा होने की बात नहीं, बल्कि दिल और रूह की ज़िंदगी-मौत भी हैं।
👉 अल्लाह जो चाहे, उसमें से नफ़्सान और जन्नत व जहन्नम का रास्ता बनाता है।

[61] "तुम जिसे चाहते हो बिना हिसाब के देते हो" — अल्लाह की बेपनाह रज़ाक़त

👉 अल्लाह अपने बंदों को बिना किसी हिसाब किताब के देता है।
👉 इसका मतलब है कि वह या तो इतना देता है कि गिनती नहीं हो सकती, या ऐसे देता है जो किसी की उम्मीद से बाहर हो।
👉 जैसा कि कुरान में भी है कि अल्लाह किसी को ऐसी जगह से रज़ाक़ देता है जिसकी उन्हें उम्मीद नहीं होती।

सबक़:
अल्लाह की ताक़त और मर्ज़ी हर चीज़ पर हावी है — दिन-रात, ज़िंदगी-मौत, रज़ाक़त — सब उसी के हाथ में है। इंसान को अल्लाह पर पूरा भरोसा रखना चाहिए।

Ibn-Kathir

The tafsir of Surah Imran verse 27 by Ibn Kathir is unavailable here.
Please refer to Surah Imran ayat 27 which provides the complete commentary from verse 26 through 27.

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