लिप्यंतरण:( Zaalika bi annahum qaaloo lan tamassanan naaru illaaa ayyaamam ma'doodaatinw wa gharrahum fee deenihim maa kaanoo yaftaroon )
24. "यह इसलिए है क्योंकि वे कहते हैं: 'हमें तो आग कभी छू ही नहीं सकती, सिवाए गिने-चुने दिनों के [51]।' और उनके झूठ ने उन्हें उनके अपने दीन के बारे में धोखे में डाल दिया [52]।"
👉 यहाँ बताया गया है कि यहूदी लोग सोचते थे कि चाहे वे कितने भी गुनाह करें, जहन्नम की आग उन्हें सिर्फ़ कुछ ही दिन छुएगी। यह उनके ग़लत विश्वास की वजह थी।
वे ये मानते थे कि वे अल्लाह के खास बंदे हैं इसलिए उनकी सज़ा कम होगी।
👉 उनका यह झूठा भरोसा और आराम-ए-दिल उन्हें अपने दीन की सच्चाई से दूर कर रहा था।
इन्हें ये एहसास ही नहीं था कि असली दीन में खौफ़ और उम्मीद दोनों का होना ज़रूरी है।
The tafsir of Surah Imran verse 24 by Ibn Kathir is unavailable here.
Please refer to Surah Imran ayat 23 which provides the complete commentary from verse 23 through 25.

सूरा आयत 24 तफ़सीर (टिप्पणी)