लिप्यंतरण:( Rabbanaaa innaka man tudkhilin Naara faqad akhzai tahoo wa maa lizzaalimeena min ansaar )
ऐ हमारे रब! तू जिसे जहन्नम में डाल दे, यक़ीनन तूने उसे ज़लील कर दिया। और ज़ालिमों का कोई मददगार नहीं है [438]।
यह आयत उन लोगों की दुआ का सिलसिला है जो अल्लाह को याद करते हैं और उसकी बनाई चीज़ों पर सोचते हैं। अब वो ये मानते हैं कि:
जो भी जहन्नम में गया, वो सबसे ज़्यादा ज़लील हुआ, क्योंकि अल्लाह की रहमत से दूर होना सबसे बड़ी शर्मिंदगी है।
इस आयत में “ज़ालिम” से मुराद अक्सर काफ़िर (इनकार करने वाले) होते हैं — क्योंकि उनका ज़ुल्म ये है कि वो:
ऐसे लोगों का क़यामत के दिन कोई मददगार नहीं होगा,
✨ इसके उलट: मोमिन अकेला नहीं होता
कुरआन कहता है: “अल्लाह, उसका रसूल और ईमान वाले ही तुम्हारे दोस्त हैं” (सूरा मायदह, 5:55)
और एक और जगह: “अल्लाह उसका मददगार है, जिबरील, नेक मोमिन और फ़रिश्ते भी उसके साथ हैं” (सूरा तहरीम, 66:4)
इसलिए जिसे अल्लाह की मदद न मिले, वो अल्लाह की नज़रों में गिर चुका होता है — और जिसे अल्लाह की दोस्ती मिले, वो सबसे बड़ा इज़्ज़तदार होता है।
The tafsir of Surah Imran verse 192 by Ibn Kathir is unavailable here.
Please refer to Surah Imran ayat 190 which provides the complete commentary from verse 190 through 194.

सूरा आयत 192 तफ़सीर (टिप्पणी)