लिप्यंतरण:( Wa maa asaabakum yawmal taqal jam'aani fabi iznil laahi wa liya'lamal mu'mineen )
और जो कुछ तुम्हें उस दिन पेश आया जब दो लश्कर आमने-सामने हुए [376] — वह अल्लाह के हुक्म से था [377], ताकि वह मोमिनों को अलग छाँट दे।
उहुद की जंग में मुसलमानों की ज़ाहिरी शिकस्त कोई इत्तिफ़ाक़ नहीं थी,
बल्कि अल्लाह की मर्ज़ी और हिकमत के तहत हुई।
यहाँ तक कि नेक लोगों की ग़लतियाँ भी अल्लाह की इजाज़त से होती हैं।
इसमें कोई नाशुक्रापन या बग़ावत नहीं होती,
बल्कि इन हादसों में बड़ी गहरी हिकमतें छुपी होती हैं।
उहुद की हार एक इम्तिहान थी —
जिससे मोमिनों की असली सच्चाई, सब्र और ईमान की गहराई सामने आई।
इससे हमें यह सबक़ मिलता है कि:
अल्लाह के क़रीबी बन्दों की ग़लतियाँ भी उसकी इजाज़त और मर्ज़ी से होती हैं।
जैसे कि हज़रत आदम (अलैहिस्सलाम) की एक ग़लती से पूरी दुनिया का निज़ाम क़ायम हुआ,
वैसे ही उहुद में पहाड़ी दर्रा छोड़ना भी एक ग़लती थी,
मगर अल्लाह ने उसे इजाज़त से वाक़ेअ हुआ बताया — ना कि बग़ावत या नाफ़रमानी।
यह इशारा है कि सहाबा की छोटी ग़लतियाँ भी हमारी सारी इबादतों से बेहतर हैं।
और ऐसी घटनाओं के पीछे अल्लाह के बड़े मक़सद और नतीजे होते हैं,
जिनका ज़िक्र आने वाली आयतों में आएगा।
The tafsir of Surah Imran verse 166 by Ibn Kathir is unavailable here.
Please refer to Surah Imran ayat 165 which provides the complete commentary from verse 165 through 168.

सूरा आयत 166 तफ़सीर (टिप्पणी)