लिप्यंतरण:( Wa maa tanqimu minnaaa illaaa an aamannaa bi Aayaati Rabbinaa lammaa jaaa'atnaa; Rabbanaaa afrigh 'alainaa sabranw wa tawaffanaa muslimeen )
यह कि तुम हमें किस बात का दोष देते हो, सिवाय इसके कि हमने अपने रब की आयतों पर ईमान ले लिया, जब वे हमारे पास आईं [260]। ऐ हमारे रब! हम पर सब्र उंडेल दे और हमें मुस्लिम की हालत में मौत दे [261]।
ईमान वाले जादूगरों ने फ़िरऔन से कहा कि उनका क्या गुनाह है, सिवाय इसके कि उन्होंने हक़ पर ईमान ले लिया। इससे यह हक़ीक़त सामने आती है कि काफ़िरों की नाराज़गी सच्चे ईमान की निशानी होती है। जो व्यक्ति ईमान वालों और काफ़िरों दोनों को राज़ी रखे, वह अक्सर मुनाफ़िक़ होता है।
उनकी दुआ से मालूम हुआ कि उन्होंने कितनी तरक़्क़ी हासिल कर ली — उन्होंने सब्र और मुस्लिम की मौत की दुआ मांगी। यह बताता है कि नबी की सोहबत का कितना गहरा असर होता है। जो लोग कभी जादूगर और गुमराह थे, वही हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम की एक दिन की सोहबत से ईमान वाले, सहाबी और शहीद बन गए।
The tafsir of Surah Al-A’raf verse 126 by Ibn Kathir is unavailable here.
Please refer to Surah A’raf ayat 123 which provides the complete commentary from verse 123 through 126.

सूरा आयत 126 तफ़सीर (टिप्पणी)