लिप्यंतरण:( Wa katabnaa lahoo fil alwaahi minkulli shai'im maw'izaanw wa tafseelal likulli shai'in fakhuzhaa biquwwatinw wa'mur qawmaka ya'khuzoo bi ahsanihaa; sa'ooreekum daaral faasiqeen )
और हमने मूसा के लिए लौहों पर हर तरह की नसीहत और हर चीज़ की तफ़्सील [314] लिख दी और कहा: “ऐ मूसा! इन्हें मज़बूती से पकड़ो और अपनी क़ौम को हिदायत दो कि वह इनमें से जो बेहतर बातें हैं उनका पालन करें [315]। बहुत जल्द मैं तुम्हें नाफ़रमानों का ठिकाना दिखा दूँगा [316]।”
अल्लाह ने तौरात की तख़्तियों पर सिर्फ़ हुक्म ही नहीं, बल्कि हिकमतें और ग़ैब का इल्म भी लिखा था। ये तख़्तियाँ बहुत कीमती (जैसे याक़ूत/पुखराज) से बनी थीं और उनमें बड़ी रूहानी हैसियत थी। जब वे मूसा (अ.स.) के हाथ से गिरीं, तो हिदायत और रहमत बाक़ी रही, जबकि ग़ैब का इल्म उठा लिया गया।
अल्लाह ने हुक्म दिया कि मूसा (अ.स.) खुद सब्र और मज़बूती से इन पर अमल करें और अपनी क़ौम को भी ताकीद करें कि वे इनकी बेहतर बातों को थाम लें। इससे मालूम हुआ कि इलाही किताबों में सिर्फ़ ज़ाहिरी अहकाम ही नहीं, बल्कि रूहानी इशारे और बाअतिनी हिकमतें भी होती हैं।
अल्लाह ने आगाह किया कि वह मूसा और उनकी क़ौम को गुज़रे हुए नाफ़रमानों की बर्बाद बस्तियाँ दिखाएगा — जैसे फ़िरऔन के महल, ‘आद और समूद की उजड़ी हुई क़ौमें। ये सबक़ हैं कि जो लोग इलाही हिदायत को छोड़ देते हैं, उनका अंजाम हमेशा हलाकत और बर्बादी होता है।
The tafsir of Surah Al-A’raf verse 145 by Ibn Kathir is unavailable here.
Please refer to Surah A’raf ayat 144 which provides the complete commentary from verse 144 through 145.

सूरा आयत 145 तफ़सीर (टिप्पणी)