लिप्यंतरण:( Wa iz qeela lahumuskunoo haazihil qaryata wa kuloo minhaa haisu shi'tum wa qooloo hittatunw wadkhulul baaba sujjadan naghfir lakum khateee'aatikum; sanazeedul muhsineen )
और जब उनसे कहा गया: “इस बस्ती में दाख़िल हो जाओ और उसमें जहाँ चाहो, खाओ [367], और कहो: ‘हमारे गुनाह दूर कर दे’ [368], और दरवाज़े में सज्दा करते हुए दाख़िल हो। हम तुम्हारे गुनाह बख़्श देंगे [369] और हम नेकी करने वालों को और ज़्यादा देंगे।”
यहाँ जिस बस्ती का तज़किरा है, उससे मुराद बैतुल मुक़द्दस (यरुश्लम) है। यह नबियों का शहर है और इसमें रहना अल्लाह की बड़ी नेमत है।
उन्हें इजाज़त थी कि जहाँ चाहें, खेतों और बाग़ों से खाएं। साथ ही हुक्म दिया गया कि अल्लाह से दुआ करें: “हमारे गुनाह दूर कर दे।”
उन्हें कहा गया कि दरवाज़े से सज्दा करते हुए दाख़िल हो और “हित्तह” (हमारे गुनाह बख़्श दे) कहो। लेकिन उन्होंने मज़ाक़ उड़ाया और “हित्तह” की जगह “हिन्तह” (गेंहूँ) कह दिया। इस तरह उन्होंने आख़िरत की मग़फ़िरत के बदले दुनिया की चाहत को तरजीह दी।
The tafsir of Surah Al-A’raf verse 161 by Ibn Kathir is unavailable here.
Please refer to Surah A’raf ayat 160 which provides the complete commentary from verse 160 through 162.

सूरा आयत 161 तफ़सीर (टिप्पणी)