लिप्यंतरण:( Ittabi'oo maaa unzila 'ilaikum mir Rabbikum wa laa tattabi'oo min dooniheee awliyaaa'a; qaleelam maa tazakkaroon )
जो तुम्हारे रब की तरफ़ से तुम पर उतारा गया है, उसका पालन करो, और उसके सिवा किसी और सहायक का अनुसरण मत करो। तुम बहुत कम नसीहत लेते हो [3]
इस आयत की तफ़्सीर अगली आयत से होती है: "काफ़िरों के सहायक शैतान हैं" (सूरा बक़रा: आयत 257)। यानी अल्लाह के सिवा जो सहायक माना जाता है, वह शैतान है। उसे दोस्त या संरक्षक मानना खुला कुफ़्र है, और अल्लाह के दोस्तों (औलिया) को अपना सहायक न मानना ईमान से दूर होना है।
हदीस-ए-क़ुदसी में अल्लाह फ़रमाता है: "जो मेरे दोस्त (औलिया) से दुश्मनी रखे, मैं उस पर जंग का एलान करता हूँ।"
एक और जगह अल्लाह तआला ने फ़रमाया: "बेशक, हमने शैतानों को उनका दोस्त बना दिया है जो ईमान नहीं लाते।" (सूरा आ'राफ़: आयत 27)
यानी अल्लाह के सिवा काफ़िरों का असली सहायक शैतान है। कई जगह "अल्लाह के सिवा" से यही मतलब लिया गया है। तीसरी जगह फ़रमाया गया: "उन्होंने अल्लाह को छोड़कर शैतानों को अपना सहायक बना लिया।" (सूरा आ'राफ़: आयत 30)
The tafsir of Surah Al-A’raf verse 3 by Ibn Kathir is unavailable here.
Please refer to Surah A’raf ayat 1 which provides the complete commentary from verse 1 through 3.

सूरा आयत 3 तफ़सीर (टिप्पणी)