लिप्यंतरण:( Wa kazaalika nusarriful Aayaati wa liyaqooloo darasta wa linubaiyinahoo liqawminy ya'lamoon )
और इस तरह हम आयतों को अलग-अलग तरीके से बयान करते हैं ताकि वे (काफ़िर) कहें कि तुमने पढ़ा है [229], और ताकि हम इसे इल्म रखने वालों पर वाज़ेह कर दें।
इस आयत से मालूम होता है कि क़ुरआन की आयतें सुनकर दो तरह के असर होते हैं — खुशक़िस्मत लोग उनसे हिदायत पाते हैं, और बदक़िस्मत लोग मज़ाक़ में कहते हैं, “तुम यह क़ुरआन किससे सीखते हो ताकि हमें सुनाओ?”। काफ़िरों ने इल्ज़ाम लगाया कि नबी ﷺ ने हज़रत जाबिर और हज़रत यासिर से यह इल्म लिया, फिर लोगों को सुनाया। यहाँ लियक़ूलू के लाम का मतलब तर्त़ीब है, वजह नहीं — यानी आयतों के नुज़ूल के सिलसिले से ऐसा कहना वक़ूअ में आया, इसमें कोई तज़ाद नहीं। जैसे बारिश ज़्यादातर पेड़ों को ज़िंदा करती है, लेकिन सूखे पेड़ों को फ़ायदा नहीं देती, वैसे ही क़ुरआन की आयतें हिदायत भी बनती हैं और गुमराही का ज़रिया भी, यह क़ुबूलियत पर मुनहसिर है।
The tafsir of Surah Al-Anam verse 105 by Ibn Kathir is unavailable here.
Please refer to Surah Anam ayat 104 which provides the complete commentary from verse 104 through 105.

सूरा आयत 105 तफ़सीर (टिप्पणी)