Quran Quote  : 

कुरान मजीद-6:68 सुरा हिंदी अनुवाद, लिप्यंतरण और तफ़सीर (तफ़सीर).

وَإِذَا رَأَيۡتَ ٱلَّذِينَ يَخُوضُونَ فِيٓ ءَايَٰتِنَا فَأَعۡرِضۡ عَنۡهُمۡ حَتَّىٰ يَخُوضُواْ فِي حَدِيثٍ غَيۡرِهِۦۚ وَإِمَّا يُنسِيَنَّكَ ٱلشَّيۡطَٰنُ فَلَا تَقۡعُدۡ بَعۡدَ ٱلذِّكۡرَىٰ مَعَ ٱلۡقَوۡمِ ٱلظَّـٰلِمِينَ

लिप्यंतरण:( Wa izaa ra aital lazeena yakhoodoona feee Aayaatinaa fa a'rid 'anhum hattaa yakkhoodoo fee hadeesin ghairih; wa immaa yunsiyannakash Shaitaanu falaa taq'ud ba'dazzikraa ma'al qawmiz zaalimeen )

और जब तुम उन लोगों को देखो जो हमारी आयतों के बारे में बेकार बातें करते हैं, तो उनसे मुँह मोड़ लो [133] — यहाँ तक कि वे किसी और गुफ़्तगू में लग जाएँ [134]। और अगर तुम्हें शैतान भुला दे [135], तो याद आने के बाद ज़ालिमों के साथ न बैठो [136]।

सूरा आयत 68 तफ़सीर (टिप्पणी)



  • मुफ़्ती अहमद यार खान

सूरा अल-अनआम – आयत 68

✅ [133] अल्लाह की आयतों का मज़ाक उड़ाने वाली महफ़िल से बचना

इस आयत में हिदायत दी गई है कि मुसलमान उन महफ़िलों में न बैठें जहाँ अल्लाह की आयतों का मज़ाक उड़ाया जाता है या उनका बेअदबी से ज़िक्र होता है। ऐसी बैठकों में रहना हराम है, जब तक कि मक़सद हक़ को बयान करना और ग़लत को रोकना न हो। यह हुक्म ईमान की हिफ़ाज़त के लिए है।

✅ [134] गैर-मुसलमानों से जायद मक़सद के लिए मुलाक़ात

आयत यह भी बताती है कि गैर-मुसलमानों से दुनियावी या दावत-ए-इस्लाम के मक़सद से मुलाक़ात करना जायज़ है। अगर नीयत हक़ की तरफ बुलाना है, तो यह अमल सवाब का कारण है। मगर हक़ और समझौते के बीच की हद साफ़ रहनी चाहिए।

✅ [135] भूल से बैठ जाने के बाद फ़ौरन उठना

अगर कोई अनजाने में ऐसी महफ़िल में बैठ जाए जहाँ अल्लाह की आयतों की तौहीन हो रही है, तो याद आते ही फ़ौरन उठना लाज़िमी है। भूलवश बैठने की इजाज़त है, मगर जान-बूझकर रुकना गुनाह है।

✅ [136] बुरी सोहबत का ख़तरा

इस आयत में ज़ालिमों के साथ बैठने से सख़्त मना किया गया है। बुरी सोहबत ईमान को तबाह कर देती है। जैसा कि कहा गया है — साँप जिस्म को नुकसान देता है, मगर बुरा दोस्त ईमान को ख़त्म कर देता है। इसलिए सालेह लोगों की सोहबत अपनाना ईमान की हिफ़ाज़त के लिए ज़रूरी है।

Ibn-Kathir

The tafsir of Surah Al-Anam verse 68 by Ibn Kathir is unavailable here.
Please refer to Surah Anam ayat 66 which provides the complete commentary from verse 66 through 69.

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